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नाते पाक

जब मदीने का आया समां सामने
आ गया जैसे बाग़े जनां सामने
खा के ग़श गिर गऐ हैं बेलाले ह़ज़ीं
जब न आए शहे दो जहां सामने
इश्क़ है गर अवैसी बेलाली तेरा
आप पर्दे से होंगे आ़यां सामने
मैं मदीने में हूं या मेरे ख़्वाब में
सरवरे दिं का है आसतां सामने
हम गुनह्गार मह़शर में ढूंढेंगे जब
आ ही जाएंगे तश्किने जां सामने
आज भी शम्ऐ़ इस्लाम ज़ौबार है
लाख आती रहीं आंधियां सामने
अपनी जन्नत का दिदार करता हूं मैं
मां के क़दमों का रख के निशां सामने
होती रहती ऐ़बादत है साक़िब क़मर
जब भी आता है रुख़सारे मां सामने

‘साक़िब क़मर

Saqib

गज़ल़

आदमी की है ज़ात मुट्ठी भर
पूरी है कायनात मुट्ठी भर

हिज़्र के दिन तवील कितने हैं
वस्ल की क्यूँ है रात मुट्ठी भर

बाद मरने के साथ जाएगा
आप का इल्तिफ़ात मुट्ठी भर

इन सराबों से कुछ नहीं हासिल
रेत आएगी हाथ मुट्ठी भर

जीत इक दिन कदम तेरे चूमे
क्या हुआ आज मात मुट्ठी भर

जितना जीना ख़ुशी से जी ले तू
वक्त है पास हाथ मुट्ठी भर

रब की इस कायनात में मेरी
हस्ती की है बिसात मुट्ठी भर

इतना किस बात पर अकड़ता है
तेरी है सिर्फ़ जात मुट्ठी भर

बिंदु कुलश्रेष्ठ ‘अदा’

Bindu

ग़ज़ल

नये रिश्तों में जब रिश्ते पुराने याद आएँगे
कसक दिल में उठेगी दिन सुहाने याद आएँगे

मुहब्बत की सदा साँसों पे जब भी हाथ रख देगी
तो फिर नज़रें मिलाने के बहाने याद आयेंगे

तवाज़ुन ज़ेह्न का बिगड़ा है तो बिगड़ा ही रहने दो
वगरना मेरी ज़ुल्फ़ों को वो शाने याद आएँगे

मुहब्बत में जगह होती नहीं वादा-ख़िलाफ़ी की
बहाने क्यों बनाते हो बहाने याद आएँगे

वो एहसासात के नग़्मे जो माज़ी गुनगुनाता है
फ़ज़ा में गूँजते वो सब तराने याद आएँगे

मेरे चेहरे पे मौजूदा ख़राशें पढ़ के तो देखो
तुम्हें अपने सितम के ताज़ियाने याद आएँगे

नहीं अब मोतबर कोई उमीदें मत ‘वफ़ा’ की रख
जुदा हो कर रफ़ाक़त के ज़माने याद आएँगे

कविता सिंह “वफ़ा”

Kavita

ग़ज़ल

ज़िंदगी को गुले-गुलज़ार नहीं कर पाए
मुख़्तसर ये है कि तुम प्यार नहीं कर पाए

उन से हम प्यार का इक़रार नहीं कर पाए
करना चाहा था कई बार नहीं कर पाए

एक हम ही थे यहाँ चश्मे-बसीरत वाले
और हम ही तेरा दीदार नहीं कर पाए

तेरी महफ़िल में सभी दिल से नहीं आए हैं
ये अलग बात है इंकार नहीं कर पाए

मार के आप ने सर लाख किए हैं साहब
ख़ुद को पर साहिबे-किरदार नहीं कर पाए

मैं ने अपनों को मुहब्बत से समेटे रक्खा
इसलिए कुछ मेरा अग्यार नहीं कर पाए

तुझ को देखा नहीं लेकिन तेरी नुदरत के तुफ़ैल
हम तेरे होने से इंकार नहीं कर पाए

मंज़िलें उन की क़दम बोस ‘सुमन’ क्या होंगी
राहे-पुरख़ार जो हमवार नहीं कर पाए

**सुमन धींगरा दुग्गल

ग़ज़ल

तेरी ही ख़ुशियों का पता चाहा
जाने क्या तुमने बेवफ़ा चाहा

हो रही थी घुटन मिरे दिल में
राज़ ए दिल मैंने खोलना चाहा

जोश में आ के इक दिवाने ने
सारी दुनिया को छोड़ना चाहा

इतना सुन्दर बनाया रब ने मगर
शीशे में फिर क्या देखना चाहा

फिर समंदर में फेककर पत्थर
मैंने लहरों से खेलना चाहा

याद करके तुम्हारी बातें सनम
हिज़्र ए ग़म को भूलना चाहा

शब’अखिल’की गुज़रती ही नहीं
यादों को जब भी रोकना चाहा

 

अखलेश कुमार मांझी “अखिल”

ग़ज़ल

सब की आँखों में है तस्वीर सनाशाई की
छेड़ दी बात ये किसने भला रुसवाई की

दिल के ज़ख्मो को नई ताज़गी मिल जाती है
जबभी आवाज़ कहीं गूंजे है शहनाई की

याद आता है वो वहशत का ज़माना जिस पल
मैं तो चादर में लिपट जाती हूँ तन्हाई की

अब तो जीने की मेरी कोई तमन्ना भी नही
क्या ज़रूरत है भला हौसला अफजाई की

मुझको अश्कों के समुन्दर में डूबा कर जो गया
बात मत करना मेरे सामने हरजाई की

दर्द है ज़ख़्म है अहसास है आँसू भी है
नाज़के सामने औकात क्या राअनाई की

 

मीनाक्षी “नाज़”

Meenakshi

नेपाली मित्र रचनाकार

हुसैन खान
काठमांडू‚ नेपाल

मानन्धर अभागी “सौभाग्यशाली”
काठमांडू ‚ नेपाल

~~~~~~~~~गजल~~~~~~~~~

कोही ढुकूटी लुट्छन् कोही जवानी लुट्छन्
सक्नेले यहाँ लुट्नु लुटेर सजिल्यै छुट्छन्

खान पाउञ्जेल सम्म एकै साथ रहन्छ
भाग वण्डा नमिले पछि आफु आफै फूट्छन्

तरीका यो हो नि त बडो काईदाको रहेछ
संकट परेपछि स्यालहरू एक भएर जुट्छन्

यो हाम्रो देश कस्तो होला बडो अजिब लाग्छ
पायो भने मंत्रीले आफ्नै कर्मचारी कुत्छन्

भगवान नारायण रे के को नारायण नामर्द
लम्पसार परेर वर्षौंसम्म कुम्भ कर्ण झैं सुत्छन् 

Man-2

संजय को सिर्जना
चितवन पर्सा‚ खैरहनी‚ नेपाल

**************गजल************

पिउदै जादा शराब, मात अर्कै हुन्छ
ढल्दै जान्छ रात , बात अर्कै हुन्छ

गुलाब पनी फुल, कमल पनी फुल नै
हरेक फुलको किन, पात अर्कै हुन्छ

पक्का केही गोलमाल, भएर त होला
एउटै धर्मलम्बीको, जात अर्कै हुन्छ

पृथ्बी र जिबन, सुन्य भए रत होनी
ठाउँ समय फरक, दिनरात अर्कै हुन्छ

काम क्रोध लोभ मोह अहंकार त्याग
ममत्वको रहदैन भाव, गात अर्कै हुन्छ

हृदय सफा छ ‘संजय’ रुखो बोली भएनी
रुखो बोलीमा मायाको, खात अर्कै हुन्छ

 

Shivaram Khadka
काठमांडू‚ नेपाल

गगनका सितारा झरेका सरी छन्
अधरमा कलेटी नयनमा झरी छन्
भयो भो नआऊ ! तिमी व्यड़्ग्य गर्न
यहाँ स्वार्थ लुट्ने हजारौँ थरी छन्

S

Rudra Adhikari
काठमांडो‚ नेपाल

नबुझ्नेले नि बुझ्छ समयले पढाएपछि
फेरि माैका पाइन्न एकपटक गुमाएपछि
यसले कसैकाे सुन्दैन आफ्नै सुरमा हिड्छ
तर जवाफ चाहिँ दिन्छ समय आएपछि

Rudra
प्रकाश बस्नेत गफाडी

काठमांडू‚ नेपाल

भोजन सम्झेर भोक मार्नुको पीडा कति होला
जीतको नजिक पुगि हार्नुको पीडा कति होला
रित्तो हुँदा पनि भरिएको नाटक गर्नु पर्छ
मह हेरेरै मुख मीठो पार्नुको पीडा कति होला

Basnet