घबरा गये हैं वक्त की ़़़़़

– ग़ज़ल – घबरा गये हैं वक्त की तनहाइयों से हम उकता चुके हैं अपनी ही परछाइयों से हम साया मेरे वजूद की हद से गुज़र गया अब अजनबी हैं आप शनासाइयों से हम ये सोच कर ही खुद से मोख़ातिब रहे सदा क्या गुफ़्तगू करेंगे तमाशाइयों से हम अब देंगे क्या किसी को ये झोंके बहार के मांगें गे दिल के ज़ख़्म भी पुरवाइयों से हम जर्रीन क्या बहारों को मुड़ मुड़ के देखिये मानूस थे ख़ेज़ाँ की दिल आसाइयों से हम —– (शायरा- अफ़त...