जीवन वृत्त

नाम – अमरनाथ सोनी हमसफ़र साहित्यकार, अनवरत 14 वर्षों से साहित्य सेवा में संघर्षरत। जन्म – 10 अप्रैल 1979 शिक्षा – एम०ए० (इतिहास), एम०ए० (समाजशास्त्र) पुस्तक – (1) ज्ञान किरण (2) वैश्विक बोध प्रकाशन– सोनी पब्लिकेशन, अम्बेडकर नगर पुरस्कार – (1) कौमी एजूकेशनल सोसायटी, आलापुर (2) युवा कवि सम्मान पता – ग्राम व पोस्ट–बसखारी, जि० अम्बेडकर नगर, उ०प्र० मोबाइल नं० 07398362890, 09793398582...

जो ठोकर में बढ़ा करते ़़़

– गीत – जो ठोकर में बढ़ा करते वही इतिहास गढ़ते हैं जो सूली पर चढ़ा करते वही इतिहास गढ़ते हैं जो ठोकर में बढ़ा करते —- जो तप कर आग में कुन्दन, जो घिस कर बाद में चन्दन, जो आनों पर अड़ा करते वही इतिहास गढ़ते हैं जो ठोकर में बढ़ा करते —- लीक से हट के चलते, शिवा से डट के चलते, जो निर्बल को खड़ा करते वही इतिहास गढ़ते हैं जो ठोकर में बढ़ा करते —- जो दलितों पीड़ितों के हित, करें आलस्य न किंचित, मुकुट माथे मढ़ा करते वही इतिहास गढ़ते हैं जो ठोकर में बढ़ा करते —- जो सबकी मुक्ति में ही सुख, उठाते रहते हैं नित दुख, जो मंसूबे गढ़ा करते वही इतिहास गढ़ते हैं जो ठोकर में बढ़ा करते —-...

भारत की ऐ सुघर बेटियों ़़़

– गीत – भारत की ऐ सुघर बेटियों हमको तुम पर गर्व है एक तुम्हारे होने से ही घर दीवाली पर्व है भारत की ऐ सुघर बेटियों —– तुम्ही कल्पना तुम्ही अरुणिमा, तुम्ही शैव्या तुम्ही लक्षमा, तुम्ही बुलन्दी छूने वाली, प्यार बीज का बोने वाली, हर सपने साकार करे तू कभी नहीं इनकार करे तू लाखों पुत्रों पर तू भारी एक अकेली खर्व है भारत की ऐ सुघर बेटियों —– राजनीति में ऊँचा परचम, जैसे हो तारों में अनुपम झॉसी की रानी बन बन कर, आती रही धरा पर तन कर सीता अनसुइया की बेटी, भारत के भावों में लेटी सूखा को सावन कर डाले तुमसे ही तो सर्व है भारत की ऐ सुघर बेटियों —–...

बाप से बेटा अलग है ़़़

– गीत – बाप से बेटा अलग है चन्द पैसों के लिये सन्त के बाने में ठग है चन्द्र पैसों के लिये बाप से बेटा अलग है —– किसी की किस्मत फूटी जाये, किसी की अस्मत लूटी जाये कहीं पर ममता का हो खून, इसी से लूट हुई है दून, कोर्ट में चलते झूठे केस, पुलिस लूटते बदल कर भेष, फंस गया सारा ही जग है बाप से बेटा अलग है —– गलत लोगों का होता मान, टूटते रिश्तों का ईमान, बचाते गुनहगार को लोग, पहन कर न्याय कर्म का चोंग, मरे मानुष की लेते फीस, डाक्टर बने हुए दस शीश नग्नता ही रोम रग है बाप से बेटा अलग है —–...

हमने कहाँ से आग ़़़

– गीत – हमने कहाँ से आग लगाना सीख लिया बेबस पर ही दाग लगाना सीख लिया हमने कहाँ से आग —– मन्दिर मस्जिद औ गुरुद्वारे, बनते हैं नित साँझ सकारे दौलत की खातिर ही हमने, कितनों के घर द्वार उजाड़े लाचारों में भाग लगाना सीख लिया हमने कहाँ से आग —– गीता और कुरान भुलाकर, क्यों पावन ईमान भुलाकर अम्न चैन को ठोकर दे कर, स्वारथ की दूकान लगाकर पहरे पर क्यों नाग लगाना सीख लिया हमने कहाँ से आग —– गैरों को ही गले लगा कर, अपने रस्म रिवाज गँवा कर सुखमय अरमानों की खातिर, सबको सूली ताक चढ़ा कर अजब रुधिर का फाग लगाना सीख लिया हमने कहाँ से आग —–...