परिचय

नाम-       बालेदीन यादव साहित्यिक नाम- बालेदीन बेसहारा पिता –         स्व0 श्री जगदेव यादव (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी) जन्म तिथि –     05.07.1955 निवास –          ग्राम व पोस्ट हरैया आज़मगढ़ उ0प्र0 मोबाइल नम्बर – 9450738173  एवं  8604576030 प्रकाषित पुस्तकें – माटी महकल मोर (तीन संस्करण) पहाड़ भइल जिनगी,अभिब्यक्ति (प्रेस में) सारस्वत सम्मान – राहुल सांकृत्यायन स्मृति केंद्र आजमगढ़ श्री कृश्ण चेतना संस्थान मऊ ग्राम्या साहित्यकार कल्याण परिशद जौनपुर गोवर्धन जन कल्याण समिति आजमगढ़ विषेश –   N.C.E.R.T. द्वारा चैदह भाशाओं में एकता अखण्डता सम्बन्धी गीतों के प्रस्तुति हेतु प्रशिक्षित कार्य क्षेत्र – प्रधानाध्यापक (परिशदीय विद्यालय) महामंत्री उत्तर प्रदेषीय प्रारम्भिक षिक्षक समिति उ0प्र0                       सामाजिक विसंगतियों पर पैनी दृश्टि...

अमवा की डरिया ़़़

         – सरग से सुन्दर – अमवा की डरिया प बोले कोइलिया कगवा करेला कांव-कांव, सरग से सुन्दर बा मोर गांव। मुरगा जगावे रोज होत भोरहरिया, सजि के किसान चलें खेतवा की ओरिया, घुंघरू झनकि जाला बयला के गरवा खाले ऊंचे धरे जब पांव, सरग से सुन्दर बा मोर गांव। पिपरा क पाती नांचे ठीक दुपहरिया, चरर-मरर करे घन बंसवरिया, नदी की कछरिया में झाड़ झंखडि़या में, मोरवा नाचेला ठांव-ठांव, सरग से सुन्दर बा मोर गांव। गमके सीवान जब फूले सरसोइया, गेहुंआं क बाली झूमे लहरे केरइया, संझवा के बेला घरे अंगना के उपरा, चिरई करेली चांव-चांव, सरग से सुन्दर बा मोर गांव। मन बउराला देखि चइत महिनवां, सोनवां बिखरि जाला खेत खरिहनवां, देखि के भुलाइ जाला जिनगी क पिरवा, बालेदीन होइहें उभांव, सरग से सुन्दर बा मोर गांव।...

जनि सोच बिरना ़़़

                  – दहेज गीत – जनि सोचा बिरना हमार बहिनीं कुंआर ना रही। खूनवां जराके हमें एम0 ए0 ले0 पढ़उलऽ, सपना हजार अंखिया में तूं सजउलऽ, आजु ऊ भइल तार-तार बहिनीं कुंआर ना रही। हमरे करनवां नऽ खेतवा बिकाई, गहना माई कऽ अब बान्हे ना धराई, हीरो होण्डा आई नऽ उधार बहिनी कुंआर ना रही। खाइ के जहर आपन तजबो परनवां, डोली पहुंचाइ दीहऽ नदिया किनरवां, मिली जइहें सजनां हमार बहिनीं कुंआर ना रही। एतना सुनत रोके बोलेला बिरनवां, धीर धरा बहिनीं लवटि अइहें दिनवां, असरा पर टीकल सनसार-बहिनीं कुंआर ना रही। रतिया अन्हरिया ई कहिया ले रहिहें, कहियो रवनवां दहेजवा क जरिहें, बालेदीन कहें बार-बार, बहिनीं कुंआर ना रही।...

देसवा के सरग ़़़

            – देसवा के सरग – देषवा के सरग बनाव ऽ हो हम सबसे कहीला। एक ही समान भयल सबकै जनमवां एक बाटे धरती और एक बा गगनवां सबहीं बा एक समझाव ऽ हो हम सबसे कहीला। चोरी घूसखोरी भ्रश्टाचार के भगायदा, जाति-पाति भेद-भाव भावनां मेटायदा, षिक्षा एक देष में चलावऽ हो हम सबसे कहिला। जनसंख्या रोक के प्रदूशण घटायदा, पापी बा दहेज एके जड़ से मेंटायदा, बिटिया के जहर न ऽ पिआवाऽ हो हम सबसे कहिला। आज क जवान हाथ मल पछतात बा, आगे पहाड़ पीछे खइये जनात बा, जिअते ना केहू के मुआव ऽ हो हम सबसे कहिला। —...

पियवा बसेला देहरादून ़़़

 – बिरह गीत – पियवा बसेला देहरादून दरद दूने दून होले ननदी रहिया जाहिला दूनो जून दरद दूने दून होले ननदी पियवा बसेला देहरादून ….. देहिं झंउसाइ देले चान क चननियां बड़ा नींक लागे मोहे कारी रे रइनियां बोलिया कोइलिया करे खून दरद दूने दून होले ननदी पियवा बसेला देहरादून ….. गरमीं बेसरमीं करेजवा कंपावे सरदी बेदरदी अगिनि लहकावे बरखा क पानी लागे नूंन दरद दूने दून होले ननदी पियवा बसेला देहरादून ….. अमवा मोजरि गइलें महुआ कुंवाइल ना जानी काहें मदन बउराइल टुप-टुप चूवे रसबून दरद दूने दून होले ननदी पियवा बसेला देहरादून ….. बनिके पहार हार गरवा दबावे कनवा पकरि झुमका झपिलावे कंगना गारी देला चून-चून दरद दूने दून होले ननदी पियवा बसेला देहरादून ….. आंखि पथराइ गइल देखली न पाती वइसे जरीला जइसे तेल बिनु बाती लागल जवनिया में घून दरद दूने दून होले ननदी पियवा बसेला देहरादून ….. नेहियां सनेहिया क कइसे भुलाई बांस के कइन लेखा देलं अलगाई बालेदीन बिनुं जग सून दरद दूने दून होले ननदी पियवा बसेला देहरादून ….....

देखते देखते लगल कि ़़़

                        कविता देखते देखते लगल कि आपन गांव षहर क बाप हो गइल मंगरु कहलै हम ना जनली इ कुल अपनें आप हो गइल अइसन हवा चलल पच्छूं से बदल गइल कुल चाल ब्यूटी पार्लर खुलल जहां लइकी कटवावें बाल बाप करें मजदूरी बेटवा घूमे रोज बजार माइ के ना मिले दवाइ मेहरी पिये अनार बाप के गोड़ ना लागे बेटा ई कइसन अभिषाप हो गइल मंगरु कहलै हम ना….. एक कोखी क जनमल भाई करेल मारा-मारी अगनां में डड़वार डरावे झंखैं बाप मतारी एक लोटा पानी मंगले दूनो जालैं झपिलाई राम कृश्ण औ सरवन क कुल कथा गइल बिसराई घर के अन्दर के रिष्ता फुटही ढोलक पर थाप हो गइल मंगरु कहलै हम ना….. गुल्ली डंडा, चिकई, हाकी, ओल्हा पाती खेल गिरगिट जइसन किरकिट आके कइदिहलै कुल फेल कजरी, फगुआ चइता नकटा खेमटा गइल हेराई भोरहरिया में भजन के संग जंतसार न कहीं सुनाई माटी के एइ गीतन पर अब सबी लालीपप हो गइल मंगरु कहलै हम ना….. बढ़ल बेमारी मोबाइल क सबके कइलस पस्त रधिया, बुधिया, सगिया, सुनरी पाके भइलैं मस्त घास करत क रहरी में बतिआवेले सुरसतिया चउबिस घंटा कान सटवले घूमेला रमपतिया पढ़े वाले लइकन के मुंह से हाय हेल्लो क जाप हो गइल मंगरु कहलै हम ना….. बाबू जी अब डेड हो गइलैं माई भइलीं मम्मा डब्लू बब्लू टी0बी0 आगे नाचे झम्मक झम्मा इ कुल हाल देख के लागे गांव रसातल जाई सभे बतावा, तब कइसन इतिहास पढ़ावल जाई बालेदीन ओह दिन सब सोची जानबूझ के पाप हो गइल मंगरु कहलै हम ना….....