मुझे कहाँ मेरे अन्दर से ़़़

– ग़ज़ल – मुझे कहाँ मेरे अन्दर से वो निकाले गा पराई आग में कोई न हाथ डाले गा वो आदमी भी किसी रोज़ अपनी खि़लवत में मुझे न पा के कोई आईना निकाले गा वो सब्ज़ डाल का पन्छी मैं एक ख़ुश्क दरख़्त ज़रा सी देर में वो अपना रास्ता ले गा मैं वो चिराग़ हूँ जिसकी जि़या न फैले गी मेरे मिज़ाज का सूरज मुझे छुपा ले गा कुरेदता है बहुत राख मेरे माज़ी की मैं चूक जाऊँ तो वो उंगलियाँ जला ले गा वो एक थका हुआ राही मैं एक बन्द सराय पहुँच भी जायेगा मुझ तक तो मुझसे क्या ले गा —– (शायरा- स्व0 दाराब बानो...