जीवन वृत्त

नाम:            डॉ० श्याम बिहारी श्रीवास्तव जन्म:          01–10–1941 (जन्म कुन्डली के अनुसार)  01–10–1942 (शैक्षिक प्रमाणपत्रों के अनुसार) जन्मस्थान:  ग्राम–रेंढर, जिला–जालौन (उ०प्र०) पिता:           श्री रामसेवक श्रीवास्तव माता:          श्रीमती सरयू देवी श्रीवास्तव शिक्षा एवं व्यवसायः  प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर की शिक्षा गावँ में ही हुई तत्पश्चात् समर सिहं हायर सेकन्डरी स्कूल, रामपुरा जिला जालौन से सन् 1958 ई० में हाई स्कूल वं सन् सन 1959 मे बी.टी़.आइ. कालजे, बिरखडी़ जिला भिण्ड से शिक्षक प्रशिक्ष्ण,  सन् 1960 में शिक्षक पद पर नियुक्ति इन्टरमीडिएट स्वाध्यायी 1962 बी.ए. स्वाध्यायी 1964, एम.ए. स्वाध्यायी (हिन्दी साहित्य), 1969 पी-एच.डी. 1975 (जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वा.), सन् 2003 में प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त। कृतियाँ:  1)  बुन्देलखण्ड के रासो काव्य (प्रकाशित शोध प्रबन्ध) 2)  प्राण धँधेरे कौराछरौ (ऐतिहासिक कृति) 3)  आदिवासी लोक कला परिषद, भोपाल की पत्रिका में प्रकाशित। 4)  रेत बँधे पानी (नवगीत संग्रह प्रकाशित) 5)  समीक्षात्मक शोध आलेख एवं कविताएं अनेक संग्रहों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित। 6)  बुन्देली भाषा और साहित्य (अप्रकाशित कृति) 7)  बुन्देली भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन (अप्रकाशित कृति) 8)  उच्च शिक्षा अनुदान आयोग भारत सरकार नईदिल्ली की शोध परियोजनाओं में सन् 1984 से 1990 तक शोध सहायक के रूप में सहयोगी लेखन। 9)  बुन्देलखन्ड की पूर्वू  रियासतों में पत्र पाण्डुलिपियों का सर्वेक्षण तथा दतिया जिले में पत्र पाण्डुलिपियों का सर्वेक्षण। सर्वेक्षण शीर्षक से दोनों शोध परियोजनाएं प्रकाशित हैं। 10) ‘इन्दुरखी के गौर‘ राजवंश पर पुस्तक लिखी जारही है। 11) ‘बोलो क्या करें‘ गजल संग्रह (अप्रकाशित) 12) ‘तहाया हुआ कागज’ कविता संग्रह (अप्रकाशित) 13) ‘बियाबानों में‘ नव गीत संग्रह (अप्रकाशित) 14) अनेक राष्ट्रीय शोध संगोष्ठियों, कवि सम्मेलनों में सहभागिता, ग्वालियर आकाशवाणी और दूरदर्शन से कविता, कहानी एवं वार्ताएं प्रसारित। सम्मान:    (1) साहित्य अकादमी ग्वालियर द्वारा नव गीत रचना सम्मान वर्ष 2004 (2) बुन्बदेली विकास संस्थान छतरपुर द्वारा बुन्लेदेलखण्ड के मध्य कालीन इतिहास सम्बन्धी शोधपूर्ण लेखन के लिये वर्ष 2006 में दीवान प्रतिपाल सिंह बुन्देला स्मृति सम्मान। (3) भवभूति अलंकरण, भवभूति शोध संस्थान डबरा द्वारा वर्ष 2009 (3) हिन्दी सेवी सम्मान, हिन्दी सेवी समिति, जौरा जिला मुरौना 2010 (4) निर्दलीय पत्र समूह भ्रोपाल द्वारा निर्दलीय हिन्दी सम्मान वर्ष  2010 (5) खुशबू साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था रौन (भिन्ड) द्वारा साहित्य सम्मान वर्ष 2009 (6) आदि शक्ति कला एवं साहित्य परिषद भोपाल 2011 (7) ‘‘समकालीन हिन्दी साहित्य परम्परा में डॉ० श्याम बिहारी श्रीवास्तव के साहित्यिक कृतित्व का अनुशीलन‘‘ विषय पर जीवाजी विश्वविद्‍यालय ग्वालियर से शोध उपाधि के लिये स्वीकृत शोध प्रबन्ध वर्ष 2014 अनन्य कालोनी, सेंवढ़ा जिला दतिया म०प्र०। सम्पर्क:    अनन्य कालोनी, सेवढ़ा, जिला दतिया, म.प्र० मोबाइल सं०  9827815769...

झरती हुई चाँदनी ़़़

झरती हुई चांदनी झरती हुई चांदनी में मन डूबा डूबा लगता है। चेहरे के भीतर का चेहरा ऊबा ऊबा सा लगता है। खुशबू खुशबू हो जाते थे सिर्फ करीब गुजरने से। उस गुलशन का पत्ता पत्ता जहर में डूबा लगता है। अब उम्मीद नहीं लगती है कुछ भी यहां उजाले की। हर घर एक अंधेरी तह में बड़ा अजूबा लगता है। बेमानी उपदेश हो चुके शब्द चलन के बाहर है। जाने किस फितरत में डूबा सूबा सूबा लगता है।।...

बहुत दिनों के बाद ़़़

बहुत दिनों के बाद अपने आँगन ने पुचकारा बहुत दिनों के बाद। घर का जोगी सिद्ध बनाया बहुत दिनों के बाद।। इतना भार प्यार का, लघु मन पर कैसे झेलूँ। पहरेदार निगाहों से बचकर कैसे खेलूँ।। अवसर खुला दिया है अबकी बहुत दिनों के बाद। घर का जोगी सिद्ध बनाया बहुत दिनों के बाद।। इतना सब कुछ दिया आपने बिन झोली फैलाये। यह भटका यायावर उसको कैसे धरे उठाए। प्यासे मन की भरी गगरिया बहुत दिनों के बाद। घर का जोगी सिद्ध बनाया बहुत दिनों के बाद।। इनके उनके सबके दिल के द्वार खुले ऐसे। पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्खिन एक हुए जैसे।। पुरवैया का लगा झकोरा बहुत दिनों के बाद। थपकी देकर पास सुलाया बहुत दिनों के बाद।। माँ जैसा आँचल फैलाया बहुत दिनों के बाद। घर का जोगी सिद्ध बनाया बहुत दिनों के बाद।।...

मौसम की मार ़़़

             मौसम की मार चैड़ा-चैड़ा पाट नदी का गहरी-गहरी धार। सब उजड़े-उजड़े रूखे हैं, बे मौसम की मार।। गुमसुम-गुमसुम से पत्थर हैं घाट किनारे के। बहुत दिनों से नहीं पछीटे कपड़े लादी के ।। सियोराम की नहीं सुनाई देती कहीं पुकार। दूर-दूर तक तट सूने हैं, बे मौसम की मार।। नहीं बालते मेंढक, मछली नहीं उछलती है। सूरज की किरणें अब जल में जाल न बुनतीं हैं। बगुलों और टिटहरी के दल कबके हुए फरार। भुख गई ले उड़ा यहाँ से, बे मौसम की मार।। सीपी, शंख, रेत से खाली नदिया की झोली। विधवा जैसी माँग, नहीं सिंदूर, नहीं रोली।। ये नि भी कैसे आए हैं, क्रूर काल की मार। सब उजड़े-उजड़े रूखे हैं, बे मौसम की मार।।...

रेत बंधे पानी हैं ़़़

रेत बंधे पानी हैं जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं। लहरें हैं न हलचल है, कोई न रवानी है। जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं।। भीगना न सूखना खोखली हंसी हंसना। कदम कदम बालू के दल-दल गहरे धंसना। कागजी सलाखों में बंद हम कहानी हैं जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं।। थोड़े से भीगे तो, सीपी शंख उग आये। बगुलों की आँखों में, चमक बन उभर आये।। कुछ दिन बरसात फिर तपन की निशानी हैं। जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं।। आदमी नहीं हैं तो, पत्थर ही ढूंढ़ लिए। मन को समझाने के, यत्न बहुत खोज लिए।। पुरखों को पंद्रह दिन, शेष गुमनामी हैं।। जीवन रस क्या बचता, रेत बंधे पानी हैं।।...

महुए की गन्ध ़़़

         महुए की गंध फिर महकी धरती में महुए की गंध। समा गये बांहों में शरमीले छंद।। चमक-चमक जाती है ऋण-धन की चचंलता। बलखाती अल्हड़ता सावन सी श्यामलता।। परस-परस जाते हैं गीले मन को नयन। दूर खड़े हंसते रह जाते सब बंधन।। हो गए मिठास भरे सारे छल छंद। समा गये बांहों में शरमीले छंद।। झन्नाहट अंग-अंग छू गई सितार। सिहरन में गुणा भाग जैसा विस्तार।। कोष्ठक सब टूट गये सरल हुई भिन्ना। साधारण समीकरण हो गया अभिन्ना।। मौन मधुर स्वीकृति अब मन का अनुबंध। समा गये बांहों में शरमीले छंद।। बोल-बोल झरी एक दूधिया फुहार। तन मन में व्याप गई मीठी झंकार।। रोम-रोम रंग हुआ साँस हुई तान। आंखों ही आंखों में फूटी मुस्कान।। अंतरतर सरस भाव उठे मंद मंद। समा गये बांहों में शरमीले छंद।।...