रन्जो आलाम से ़़़

                      ग़ज़ल रन्जो आलाम से घबरा के जो डर जाते हैं सच में ऐ दोस्त इसी गम में वो मर जाते हैं दिन में बुनते हैं खयालात का ताना बाना रात में दर्द की मानिन्द बिखर जाते हैं कितने खुदगर्ज हैं वो लोग जो लालच दे कर वक्त पडृने पे यहाँ हंस के मुकर जाते हैं दिन के औकात जो दफतर के लिये लिक्खे हैं खुशनुमा शाम जो आ जाये तो घर जाते हैं अब चले आओ कि रंगीन हैं शामें अपनी साथ होते हो तो गम सारे निखर जाते हैं रोज करते हैं जो एलान वो फरदन फरदन बात जब आए सवालों की सुधर जाते हैं फब्तियां कसते हैं एहसास जो मेरे ऊपर शेरगोई पे मेरे झुक के गुजर जाते हैं...