तआरुफ ⁄ परिचय

नाम-         मु0 अब्दुल अज़ीज़ जौहर कलमी नाम-   जौहर मगहरी पिता-         मुंशी रियासत अली जन्म-       01 जुलाई 1920 स्थान-       मगहर, जिला सन्त कबीर नगर (उ.प्र.) शौक़-         शायरी तख़लीक़-      कुलियाते जौहर मगहरी पेशा-         सरकारी नौकरी (रेलवे) वफ़ात-       24 जुलाई 1987 – एक शेर – मेरी हर वफ़ा के बदले हुए मुझपे ज़ुल्म क्या क्या मेरे दिल में है अभी  तक  वही  तेरी चाह ज़ालिम...

एक हसीं ज़ोहरा ़़़

एक हसीं ज़ोहरा जबीं फिर मुझको बहकाने लगी इश्व वो अन्दाजो ग़मज़े मुझको दिखलाने लगी दख्ल फिर देने लगी आकर मेरे हर काम में फिर ख़लल अन्दाज़ होती है मेरे आराम में फिर मुझे दिखला रही है फासले पर सब्ज़ बाग़ फिर जलाना चाहती है वो मोहब्बत का चिराग़ बे सबब फिर मेरे उपर मेह्रबां होने लगी कांटे मेरी रहगुज़ारों में वो फिर बोने लगी फिर वो आमादा हुई मुझको सताने के लिये आग रौशन कर रही है फिर जलाने के लिये डालती है हर तरफ से वो कमन्दे नाज़ फिर मुझको दिखलाने लगी वो इश्व वो अन्दाज़ फिर फिर मुझे करने लगी माएल गुनाहों की तरफ मुझको ले जाती है फिर नापाक राहों की तरफ दे रही है फिर मुझे वो दावते रंगीं फ़रेब लूट लेने पर है आमादा वो मेरा सब्रो शकेब क्या करूँ फिर कर लूँ मैं उस पर यकीनो एतबार क्या करूँ फिर कर लूँ मैं अपने जिगर को बेक़रार क्या करूँ फिर आग में मैं कूद जाउँ क्या करूँ अपनी ही गरदन पे खुद ख़न्जर चलाउँ क्या करूँ लाख वो कोशिश करे धोके में आ सकता नहीं मैं किसी को भी शरीक अपना बना सकता नहीं उससे और उसकी मोहब्बत से है अब नफ़रत मुझे मेरे दिल में कोई अरमां है न कुछ हसरत मुझे दूर रहना चाहता हूँ उस से घबराता हूँ मैं अपनी तनहाई में लुत्फे ज़िन्दगी पाता हूँ मैं चाहे जो हो जाए हर एक शै को जौहर छोड़ दूँ ग़ैर मुमकिन है कि अपने अह्द को मैं तोड़ दूँ...

मुझसे मिलने की ़़़

एक मेह्रबान खातून के ख़त के जवाब में                     –– मुझसे मिलने की ख़ुदा के लिये ज़हमत न करो ख़त भी लिखने की मेरे पास यूँ जुरअत न करो मेरी गुस्ताखि़ए तहरीर पे हैरत न करो मेरी कोताहिए दामां की शिकायत न करो कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो तुमको मालूम नहीं किस क़दर मजबूर हूँ मैं ऐशो आराम की दुनिया से बहुत दूर हूँ मैं अपने ही दिल में एक रिस्ता हुआ नासूर हूँ मैं तुम मेरे वास्ते सामाने जराहत न करो कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो मैं ज़माना की निगाहों में एक आवारा हूँ ज़िल्लत आमेज़ निगाहों का मैं गहवारा हूँ मैं समझता हूँ तुम्हारे लिये नाकारा हूँ रेत ही रेत से तामीर एमारत न करो कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो मेरी ख्वाहिश है कि नग़मा मेरा बेसाज़ रहे ज़िन्दगी का मेरी जो राज़ है वो राज़ रहे मुझको क्या चाहे कोई गोशबर आवाज़ रहे ये एनायत है जो तुम मुझपे एनायत न करो कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो मेरी तख़ईल की ज़द में भी है जन्नत लेकिन मेरी नज़रों में भी है हुस्न की अज़मत लेकिन मेरे दिल में भी है एहसासे मोहब्बत लेकिन मैं कहूँगा कि ज़माना से अदावत न करो कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो तुम कि परवरदहे अल्ताफ़ो करम हो जौहर तुम कि परदाख्तए नाज़ो नअम हो जौहर तुम कि बेगानए अन्दोहो अलम हो जौहर ग़म व अन्दोह से तब्दील मुसर्रत न करो कौन कहता है कि तुम मुझसे मोहब्बत न करो क्यों न कह दूँ...

न होती दह्र मे ़़़

                     – औरत – न होती दह्र में औरत जो तारीकी नज़र आती चिराग़्रे ज़िन्दगी की रौशनी फीकी नज़र आती वबाले दोश होती ज़िन्दगी इन्सान ज़ादों पर घटाएं छाई होतीं यास की रंगीं इरादों पर मसर्रत के हसीं लम्हात भी मफ़क़ूद हो जाते इलाजे सोज़िशे दर्दे जिगर बेसूद हो जाते अलम की बारिशों से आतिशे दिल सर्द हो जाती तमन्नाए दिली सीने में अज़ ख़ुद दर्द हो जाती छलक जाता ज़रा सी देर में पैमानए हस्ती मोकम्मल ही न होता हश्र तक अफ़सानए हस्ती रमूज़े हुस्न फि़तरत ता अबद रह जाते सर बस्ता भटकते दह्र में इन्सान पाते ही नहीं रस्ता मज़ाक़े ज़िन्दगी इस ज़िन्दगी पर मुनफइल होता नज़र के ताज़ियानों से न पैदा दर्दे दिल होता न होती मयकशी होते नहीं तामीर मयखाने सुने जाते न हुस्नो इश्क़ के रंगीन अफ़साने मोकइयद दिल में होता ही नहीं जज़बात का आलम कभी होता नहीं बेदार एहसासात का आलम बहिश्ते गोश होता यूँ न ज़िकरे गेसुओ साना जवानी की निगाहों में न होता कोई अफ़साना तममन्ना आंसुओं से तिश्नगी अपनी बुझा लेती जवानी तंग बे कैफ़ी से आकर ज़ह्र खा लेती चढ़ा होता ख़ेज़ा का रंग मतवाली बहारों पर ग़मो आलाम होते हुकमरां दिलकश नज़ारों पर न ज़ुल्फे नव ओरुसे ज़िन्दगी पुरपेचो ख़म होती न होती ज़िन्दगी की हिर्स होती भी तो कम होती हर एक सुबहे मोसर्रत ख़ेज़ शामे रन्जो ग़म होती ये दुनिया अहले दुनिया पर ज़रीफ़ाना सितम होती रबाबे ज़ीस्त पे नग़मे कभी गाये नहीं जाते रमूज़ो फ़लसफ़ा तहरीर में लाए नहीं जाते न होती इम्तज़ाजे रंगो बू खामा फ़रसाई तहइयुर मेंन होते हुस्ने फ़ितरत के तमाशाई निज़ामे...

तरानए आज़ाद हिन्दोस्तान ़़़

        तरानए आज़ाद हिन्दोस्तान शरीके जंगे आज़ादी हर एक पीरो जवां होगा वो दिन नज़दीक है आज़ाद जब हिन्दोस्तां होगा डुबोई जाएगी बहरे अरब में ज़ुल्म की कश्ती हर एक देवे सितम फिर ग़र्क बहरे बेकरां होगा फ़ेज़ा बदली नज़र आएगी इसकी दौरे दौरां से नई इसकी ज़मी होगी नया ही आसमां होगा वतन के लोग होंगे इश्तराके कार पर माएल न होगा कोई महकूम और न कोई हुकमरां होगा न खौफे बर्क़ होगा और न कुछ सइयाद का खटका चमन अपना ही होगा और अपना बाग़बां होगा यहाँ की खाके मुर्दा में नई जां आएगी फिर से हर एक ज़र्रा मिसाले मेहरे ताबां ज़ौफेशाँ होगा मोसर्रत के तराने गाएंगे आपस में सब मिल कर फरावानी खुशी की होगी हर एक शादमां होगा बहारें खिंच के आजाएं गी इसके गोशे गोशे में ये उजड़ा गुल्सितां सद नाजि़शो रश्के जनां होगा जेहालत, तंगदस्ती, मुफलिसी मिट जाएगी आखि़र यहाँ बेरोज़गारी का न कुछ नामो निशाँ होगा वतन मरकज़ बनेगा हर तरह के इल्मो दानिश का ये एक दिन नाक़ए तहज़ीब का भी सारेबाँ होगा इसे हैरत से देखेंगे तरक्क़ी याफ्ता किश्वर बवजहे शर्म उनके मुँह पे एक उड़ता धुआँ होगा यक़ीं है और हाँ कामिल यक़ीं है मुझको ऐ जौहर ओरूजे कामयाबी पर कभी हिन्दोस्ताँ होगा –––– 1942...

इन्तजत्रारे सुब्ह से ़़़

– ग़ज़ल – इन्तज़ारे सुब्ह से ऐसे में घबराएं गे क्या रात के पिछले पहर साग़र छलक जाएं गे क्या आंधियां भी जिन चिरागों को न ठन्डा कर सकीं तेरे दामन की हवाओं से वह बुझ जाएं गे क्या जो जेहादे ज़िन्दगी में खेलते हैं मौत से वो तेरी तोपों से बन्दूक़ों से डर जाएं गे क्या अहले ज़र देते हैं क्या क्या दावते रंगीं फ़रेब उनकी साज़िश उनकी चालों में हम आ जाएं गे  क्या अम्ने आलम के लिये एक मुस्तक़िल खतरा हैं जो झूठ है इन्सानियत पर वो तरस खाएं गे क्या खुल गया दुनिया पे अब शेखो बरहमन का फ़रेब वो धरम के नाम पर अब हमको कटवाएं गे क्या अहले हक़ को धमकियां दारो रसन की हैं अबस यूँ वो अज़मे आहनी से बाज़ आ जाएं गे क्या आ रही है इस चमन में भी बहारे बेखेज़ाँ ग़ुन्चे मुरझाएं गे क्या अब फूल कुम्हलाएं गे क्या मुतमइन फ़रदा से हम हो जाएंगे क्या वाक़ई सच बता जौहर वो दिन अब जल्द ही आएं गे क्या...