तआरुफ़ ⁄ परिचय

नाम-             मुहम्मद कलमी नाम-     एम॰कोठियावी राही पैदाइश-          1935, कौरियापार, आज़मगढ़ (मौजूदा मऊनाथ भंजन) वतन –            गोरखपुर (उ0प्र0) वफ़ात –           21 सितम्बर 2005 तख़लीक़-         ग़ज़ल, नज़्म, क़ता, अफ़साना, ड्रामा आदि। खुदा करे कि सितारों को भी ज़बान मिले कि गुफ्तगू कि लिये कोई मेह्रबान मिले दिया मिला न सदाएं न ज़िन्दगी राही तुम्हारे शह्र में ऐसे भी कुछ मकान मिले...

कहें और क्या बस ़़़

– ग़ज़ल – कहें और क्या बस चलो दोस्तो जहाँ भी रहो खुश रहो दोस्तो ज़मीं पर अगर गिर पड़े आसमां तो दरियाओं पर गिर पड़ो दोस्तो किसी और से ये न सुन पाओगे मैं जो कह रहा हूँ सुनो दोस्तो ये चाँद और ये कहकशाँ क्या करुँ किसी और को बख़्श दो दोस्तो ख़ेजाँ ता ख़ेजाँ गर्द है ख़्वाब की बहारों को आवाज़ दो दोस्तो —–...

दोस्तो ठीक है हर ़़़

– ग़ज़ल – दोस्तो ठीक है हर गाम पे अब जंग करो है इसी में बड़ा आराम हमें तंग करो मोम के जिस्म बुलाते हैं जलाने के लिये तुम भी पत्थराए हुए हो तो मेरा संग करो अपनी सूरत मेरी सूरत में न पाओगे अभी और कुछ रोज़ तमन्नाए गुलो-रंग करो ख़ाक को ख़ाक में मिल जाने दो फ़ुरक़त कबतक रूह को रूह से ऐ दोस्त हम आहंग करो ज़ह्र भी साथ न देगा अगर आँसू टपके इस घड़ी मत मरी आँखों को लहू रंग करो ऐसे अल्फ़ाज़ तराशो जो नये हों राही अपने दीवान से पैदा नये फरहंग करो —–...

न आँख लग सकी ़़़

– आहंग – न आँख लग सकी अपनी न आज ग़म रोया फ़ेज़एं भीग गईं चाँद इस क़दर रोया अवध की शाम का अफसाना याद आता है दयारे शौक़ का वीराना याद आता है मजाज़ नाम का दीवाना याद आता है कि आज सूरते-शहनाज़ व लालारुख तनहा किस की याद में आहंग पढ़ रही हो तुम तुम्हें भी आज ग़मे दिल ने दश्ते वहशत में बुला लिया है कि चाहत किसी की याद करो वो मैकदे में गया क्यों यहाँ न क्यों आया तुम आज वहशतो-हसरत किसी की याद करो ओफ़क़ की ओट से वह भी ये देखता होगा कि उसके बाद शबिस्ताँ पे क्या गुज़रती है क़दम क़दम दिले-याराँ पे क्या गुज़रती है जमाले-शह्रे-निगाराँ पे क्या गुज़रती है इरादा है कि चमन के शगुफ़्ता फूलों में अगर मुझे भी बहारों ने वहशतें बख़्शीं फलक के चाँद सितारों ने वहशतें बख़्शीं तो मैं भी फेर के हँसते हुए गुलों से नज़र जो हो सका तो कोई रंग छोड़ जाऊँगा तुम्हारे वास्ते ’’आहंग’’ छोड़ जाऊँगा —–...