जीवन वृत्त

नाम-           डॉ० प्रतिभा सिंह माता-          श्रीमती ऊषा सिंह पिता-          श्री दयाशंकर सिंह जन्मस्थान-   ग्राम व पोस्ट- मनिहारी जिला-गाजीपुर (उ0प्र0) शिक्षा-   एम.ए. (इतिहास, शिक्षाशास्त्र), बी0एड0, पी-एच0 डी0 (इतिहास) स्थाई पता-   ग्राम व पो0- किशुनपुर, जिला-आजमगढ़ (उ0प्र0) ई-मेल-    pratibhagagansingh@gmail.com रचनायें-   जाऊँ कहाँ (नारी समस्याओं पर आधारित बीस कहानियों का संग्रह) इसके अतिरिक्त कई लिपिबद्ध रचनायें अप्रकाशित। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। रेडियो, दूरदर्शन पर कविता प्रसारण। काव्यमंचों पर आकर्षक काव्य पाठ।                             ...

मैंने देखा जब ़़़

( मैंने देखा ) मैंने देखा! जब शीत भी दुबककर रजाई ओढ़े हुए थी और धूप बैठकर आग ताप रही थी फटे और मटमैले कपड़े में लिपटी उस नन्ही सी काया को जो, सड़क के किनारे पड़े कचरे के ढेर में अपनी किस्मत खोज रहा था करीब आठ वर्ष का बालक जबान से तो चुप था मैं आखों से बोल रहा था उसमें बच्चों जैसी चंचलता कहाँ थी बचपन में बचपन खोकर जीवन को खोज रहा था कभी ऊँची अट्टालिकाओं को देखता तो कभीं कचरा उठाता एक नजर उसने मेरी तरफ भी देखा फिर अपने काम में लग गया पता नहीं, ये नफरत की नजर थी या दर्द भरी पर मैं, अबतक नहीं भूली वो चेहरा निश्च्छल मौन ये सोच रही हूँ अब भी आखिर दोषी कौन ? आखिर दोषी कौन ?     ...

हर शाम को दिये संग ़़़

(हर शाम को दिये संग जलते हुए देखा है) हर शाम को दिये संग जलते हुए देखा है इस उम्र को वक्त संग ढ़लते हुए देखा है क्यों ? रात की खामोशियों में दिल उदास हो गया पीछे कभी हैं देखते, पाया है क्या,क्या खो गया किसकी तलाश में ताउम्र घूमते रहे समझा नहीं कभी हम फिर भी ढूँढते रहे और भी, गहरा गया है यह अंधेरा दिल के पंक्षी को न जाने चाहिए कैसा बसेरा रात के इस धुंधलके को एक किरण मिल जाये तो हर मन की रेतीली जमीं पर एक कली खिल जाये तो हर शाम जलना छोड़ दे यह वक्त ढ़लना छोड़ दे रात की खामोशियों में दिल पिघलना छोड़ दे बर्सात ऐसी आये जिसमें हर गिले धुल जायें प्रेम की गंगा से दिल के द्वार भी खुल जायें राह मत रोको इस सरिता को अब बहने दो बस मनुष्यता फिर सांस ले ऐसी हवा चलने दो अब।       ...

मत जन्म दो ़़़

( मत जन्म दो ) मत जन्म दो, माँ, मुझे इस दुनिया में नहीं जीना है कष्ट, वेदना, तिरस्कार छोटी सी उम्र में बलात्कार और तो और जमाने भर की दुत्कार रोज मौत का जहर मुझे नहीं पीना है माँ मुझे नहीं जीना है स्वस्थ समाज, स्वस्थ जीवन न दे सको ते मुझे मौत दे दो डरती हो क्यूं, समाज से, कानून से, ममता से इस जीवन से हंसी मौत बेखौफ दे दो माँ, मुझे मौत दे दो मुझे तो, अपनो से डर है, गैरो से भी स्वयं से लाचार हूँ औरों से भी जब कोई अपना मेरी अस्मिता से खेलेगा जब कोई गैर मुझे कामुक नजरों से भेदेगा उस क्त को माँ, तुझे भी तेरी इज्जत प्यारी होगी मेरी जिन्दगी नहीं तेरे गिरते हुए आँसू मुझे आत्महत्या पर मजबूर करेंगे तब तो तुझे शर्म नहीं आयेगी जब, इस दुनियां से मेरी अर्थी उठ जायेगी इसलिए माँ, मुझे नहीं जीना है हर रोज मौत का जहर मुझे नहीं पीना है माँ, मुझे नहीं जीना है।       ...

मैं चौखट हूँ ़़़

( चौखट हूँ मैं ) मैं, चौखट हूँ, सजोये रखी है मैंने कई वर्षों की यादें न भूली हैं अबतक वो बीती हुई बातें पिछली तीन पीढि़यों से इस घर की देखभाल करने में लगा हूँ हर मित्र और शत्रु से मेरे अपनों की ढाल बनने में लगा हूँ याद आता है मुझे मेरे अस्तित्व में होने का वो पल जैसे लगता है अभी तो बीता है वो कल शुभ मुहूर्त में पवित्र मन्त्रों के मध्य घर के प्रथम द्वार पर लोगों ने मुझे बैठाया था उस दिन तो गोतिनों ने भी क्या खूब गीत गाया था तबसे, इस घर की सीमा से बंधा हूँ पर्दे में पैबंद सीने में लगा हूँ पर जबसे बुजुर्गों की आँखे नम होने लगी है मेरी भी इज्जत घर में कम होने लगी है। मुझे अब तो घर में कोई पूजता नहीं है जैसे बुजुर्गों को कोई पूछता नहीं है फिर भी, मेरे अन्दर विश्वास है, सुरक्षा है, प्यार है वैसे तो कहने को अपना संसार है सच ये है, मेरे बाहर की दुनियाँ तो बस एक व्यापार है मैं चौखट हूँ हाँ मैं चौखट हूँ।     ...