परिचय

– परिचय – नाम-     राकेश कुमार श्रीवास्तव पिता-     श्री मुंशी लाल श्रीवास्तव शिक्षा-     एम्०ए० (इतिहास एवं हिंदी) कार्य-      शासकीय शिक्षक अभिरुचियाँ-  कवितायेँ सुनना, पढना एवं लिखना विधा-      गीत, ग़जल, घनाक्षरी छन्द , दोहे लेखन कृतित्व-    गीत संग्रह एवं ग़जल  संग्रह (अप्रकाशित) पता-      गोस्वामी मोहल्ला, वार्ड 4, सेंवड़ा जिला दतिया (मध्य प्रदेश) पिन 475682 मोबाईल-    9098605012...

चिड़ियों का कलरव ़़़

       //कुछ गीत// चिड़ियों का कलरव बंद हुआ भंवरों का गुंजन मंद हुआ ऐ देश मेरी आँखें नम हैं क्यों तेरा वन्दन बंद हुआ। चौपालों पर सूनापन है कहने भर को अपनापन है सच कहने का साहस किसमे झूठों का ही आराधन है। मानवता सिसक रही है और समरसता पर प्रतिबंध हुआ। ऐ देश मेरी आँखें नम हैं क्यों तेरा वन्दन बंद हुआ।      —–1 धरती से अम्बर तक देखो नदियों से सागर तक देखो चहुँ ओर कुहासा छाया है पनघट से गागर तक देखो। भंवरों संग नाव डुबाने का पतवारों में अनुबंध हुआ। ऐ देश मेरी आँखें नम हैं क्यों तेरा वन्दन बंद हुआ।      —–2 श्रंगारिकता अश्लील हुई लज्जा बुझती कंदील हुई कैसा इतिहास बनेगा अब जब संस्कृति ही तब्दील हुई। मर्यादा होती तार तार सब कुछ इतना स्वछन्द हुआ। ऐ देश मेरी आँखें नम हैं क्यों तेरा वन्दन बंद हुआ।      —–3 जुड़ गए हैं पूरी दुनिया से पर अपने घर से टूट गए। गैरों से समझौते करते पर हम अपनों से रूठ गए। घर बदल गए हैं कमरों में ये कैसा उचित प्रबंध हुआ ऐ देश मेरी आँखें नम हैं क्यों तेरा वन्दन बंद हुआ।      —–4 मस्जिद सूनी मंदिर सूने गिरिजाघर  गुरूद्वारे सूने हर जगह लगी है भीड़ मगर बिन भक्तों के भगवन सूने। बाहर मन सब मिल जाते हैं अंतर्मन मिलना बंद हुआ। ऐ देश मेरी आँखें नम हैं क्यों तेरा वन्दन बंद हुआ।      —–5           ...

तम से घबरा कर ़़़

– गीत – तम से घबराकर जीवन को यूँ ही तुम ठुकराओगे, पीर ख़ुशी की निकट सहेली जब तक जान न जाओगे आंसू ने जब प्रथम बार आँखों से विदाई मांगी होगी क्या मालूम क़ि खुशियाँ होंगी या गम की परछाईं होगी आंसू के इस द्वंद्व सा जीवन जब तक सीख़ न जाओगे तम से घबराकर जीवन को यूँ ही तुम ठुकराओगे ओस को ये मालूम है उसको भोर के संग में मिट जाना है जीवन है अनित्य फिर भी अपना अस्तित्व दिखा जाना है एक रात का जीवन जीना जब तक सीख न जाओगे तम से घबराकर जीवन को यूँ ही तुम ठुकराओगे समय बहुत बलवान है एक दिन सब पर घात  लगाता  है बुरा समय जब आता तो साया भी न साथ निभाता है कठिन समय में धीरज धरना जब तक सीख न जाओगे तम से घबराकर जीवन को यूँ ही तुम ठुकराओगे मन में मैल न रखना जब कोई अपना  तुम्हें सताता  है सूरज का रथ कोई नहीं चंदा ही रोकने आता है जब तक सूरज सी विशालता अपने उर ना लाओगे तम से घबराकर जीवन को यूँ ही तुम ठुकराओगे...

दुश्मनी में वक्त जाया ़़़

– ग़ज़ल – दुश्मनी में बक्त जाया बेवजह किया मुखबिरी अपनों ने की शक बेवजह किया शाखों की साजिशों से जमींदोज था दरख़्त हमने तो आँधियों को दोष बेवजह दिया सर्द रातों में सुलाया जिसने आँचल में हमें उससे कहते हो की कम्बल बेवजह लिया तुझसे मिलने पर हमें मालूम ये हुआ हमने अब तक जिन्दगी को बेवजह जिया जिन्दगी का सच सियासतदान के जैसा रहा हमने तो उस पर भरोसा बेवजह किया                     ...

रिश्ते भी अब तो ़़़

                – ग़ज़ल – रिश्ते भी अब तो हमको निभाने नहीं आते त्योहार भी तो हमको मनाने नहीं आते ये कैसी शोहरतो का नशा हम पे चढ़ा है जिनकी बजह से हम है वो हमको नहीं भाते जो दिल में हमारे है वही तो जुबाँ पे है हमको तो बहाने भी बनाने नहीं आते मैखानों में कुछ लोग शौक से ही आ गए सब लोग यहाँ गम को भुलाने नहीं आते सब अपनी अपनी कीमतें हैं तय किये हुए बस आप सही भाव लगाने नहीं आते                 ...

कोई भी मसला हो ़़़

                   – ग़ज़ल – कोई भी मसला हो उसका हल निकलता है रात कितनी स्याह हो सूरज निकलता है। चंद दिन भी दुश्मनी ढंग से निभा पाए नहीं ये सियासत है यहाँ सब कुछ बदलता है। क़त्ल होगा आज सब छज्जों पे आ गए क़ातिलो पर एक भी पत्थर न चलता है। बेबशी का हाल विधवा माँ से जाके पूछिये जिसका बच्चा बाप की खातिर मचलता है। आज भी गुड़िया न ले पाई थी जिस मजबूर ने अपने घर जाने में वो कितना दहलता है।...