तआरुफ़ ⁄ परिचय

  नाम-          अब्दुल राशिद सिद्दीक़ी तख़ल्लुस-     राशिद सिद्दीक़ी वल्दियत-     जनाब अब्दुल वाजिद मरहूम सन पैदाइश-  03 जून 1936 जाये पैदाइश-  ख़ूनीपुर, गोरखपुर (उ.प्र.) तालीम-        इन्टर (1956) आग़ाज़ शायरी- 1952 तख़लीक़-     (1) बूए मदीना (नातिया कलाम) (2) कर्बे सदा (ग़ज़लों का मजमूआ) (3) चिराग़े हरम (नातिया कलाम) (4) पैकरे इन्सानियत (5) ग़ुबारे-शब (ग़ज़लों का मजमूआ) (6) गहराई (ग़ज़लों का मजमूआ) वफ़ात- – क़ता – उलझ रहे हैं वो कमज़र्फ बेसबब हमसे ये जानते हुए क़ाएम है ये अदब हमसे किसे अब अपना कहें और किसको बेगाना गुरेज़ करते हैं राशिद यहाँ तो सब हमसे...

बच्चे होनहार हो गये ़़़

– ग़ज़ल – बच्चे होनहार हो गये रौनक़े बहार हो गये फ़ासला था जिनसे उम्र भर वो गले का हार हो गये गुल बरस रहे हैं हमपे यूँ जैसे हम मज़ार हो गये हश्र का यक़ीन हो गया लोग बेशुमार हो गये ठोकरें जब अपनों से मिलीं ग़ैर मेरे यार हो गये आज हर तरफ ख़ोलूसो-मेह्र नज़रे-इन्तशार हो गये अब तो अपना ज़ुल्म रोकिये हम भी होशियार हो गये राशिद आज अपने शह्र में राह का ग़ुबार हो गये...

ऐशो इशरत में ़़़

– ग़ज़ल – ऐशो-इशरत में खो गये हम लोग क्या थे क्या आज हो गये हम लोग मिट रहे हैं नक़ूश माज़ी के इस ज़माने से लो गये हम लोग उम्र भर जागते रहे लेकिन वक़्त आया तो सो गये हम लोग क्या उगे फस्ल एकता की यहाँ बीज नफ़रत के बो गये हम लोग बे सबब बादबाँ का क्या शिकवा ख़ुद ही कश्ती डुबो गये हम लोग वो भी क्या हौसला था ऐ राशिद सख़्त दिल में समो गये हम लोग...

मेरे अफ़कार का सौदा ़़़

– ग़ज़ल – मेरे अफ़कार का सौदा सरे बाज़ार हुआ एक ऐसा भी तमाशा सरे बाज़ार हुआ आज फिर ख़ैर नहीं अह्ले जोनूँ की शायद आज फिर हुस्न का चर्चा सरे बाज़ार हुआ कोई असमत का ख़रीदार कोई सौदागर मुझसे मत पूछ कि क्या क्या सरे बाज़ार हुआ हुस्न ने ख़ुद ही नज़र अपनी उठाई होगी इश्क़ बेकार ही रुसवा सरे बाज़ार हुआ ख़ुद ही बीमार हैं और ख़ुद ही मसीहा भी हैं ये भी एक तर्जे मदावा सरे बाज़ार हुआ आ गया काम तेरे तेरा जोनूँ ऐ राशिद कोई तुझसे भी शनासा सरे बाज़ार हुआ...