तआरुफ ⁄ परिचय

  नाम – अब्दुल रशीद तखल्लुस – सफ़वी बाराबंकवी पैदाइश – 01 जनवरी 1936 684, दारुल ग़नी, कानून गोयान, बाराबंकी (उ०प्र०) तालीम – 1950 में हाई स्कूल– नबेल्ट इस्लामिया इन्टर कालेज बाराबंकी 1953 में फ़ारसी में मुन्शी – अरबिया दारुल ओलूम 1955 में इन्टरमीडिएट – गवर्नमेन्ट इन्टर कालेज मोलाज़िमत– 03 अप्रैल 1956 – टाइपिस्ट चीफ़ सिक्योरिटी आफिस, एन०ई०रेलवे, गोरखपुर शौक़ – शायरी, अफ़साना निगारी शागिर्द – वसी, वारिस, बख्शी, साबिर, शान्ती, हमीद, राही, राहिल और अनवर। शेर – तस्वीर तेरी खींच के मसरूर है दिल में सफ़वी की सना मानी–वो–बोहज़ाद करेंगे...

नात शरीफ़ ़़़

– नात शरीफ़ – निगाह हक़ से वाबस्ता है मैखाना मुहम्मद का जो दीवाना खुदा का है वो दीवाना मुहम्मद का जिसे जन्नत से तश्बीह देना ग़ैर मुमकिन है मदीने की हैं वो गलियाँ वो काशाना मुहम्मद का रहे गा हश्र तक वो बेनेयाज़ कौसरो–ज़मज़म अज़ल से पी के आया है जो पैमाना मुहम्मद का जिसे देखा वो बीमारे मुहब्बत हो गया उनका बेहम्दुल्लाह अन्दाज़े तैबाना मुहम्मद का फ़क़ीरों को भी मिलती है शहिन्शाही यहाँ सफ़वी ये वो दरबार है दरबारे शाहाना मुहम्मद का (मौरखा 19 दिसम्बर 1958)...

सैयाद भी चमन में ़़़

– ग़ज़ल – सैयाद भी चमन में है और बाग़बाँ भी आज फिकरे बहार भी है ग़मे आशियाँ भी आज सहबाए लुत्फ दोस्त से सरशार थे जो कल दामन कुशाँ है उनसे मए अरग़वाँ भी आज उफ तेरी सादगी की ये रानाई तमाम हैं शर्मसार तुझसे महो कहकशाँ भी आज शरहे जमाले यार किसी से न हो सकी जुम्बिश आ के रह गये कौनो मकाँ भी आज सफवी ये इन्क़लाबे ज़माना का है असर मुँह फेरते हैं मुझसे मेरे मेह्रबाँ भी आज (नवम्बर 1960)...

ज़ुल्म ढाते हैं वो ़़़

– ग़ज़ल – ज़ुल्म ढाते हैं वो आसमाँ की तरह हम तड़पते हैं एक बेज़बाँ की तरह किस से अब शिकवए बेवफाई करें पेश आते हैं वो मेह्रबाँ की तरह उनकी चश्मे करम हो गई ग़ैर पर हम तड़पते रहे नीम जाँ की तरह वो बबातिन तो कुछ मेह्रबाँ हैं मगर उनकी नज़रें हैं ना मेह्रबाँ की तरह साथ सफ़वी के मैखानए इश्क़ में शेख भी आए पीरे मोग़ाँ की तरह (9 जनवरी 1961)...

शिकवए तन्ज़ीमे गुलशन ़़़

– ग़ज़ल – शिकवए तन्ज़ीमे गुलशन क्या करें गुल्सिताँ वालों से अनबन क्या करें हमको दुनिया छोड़ने का ग़म नहीं छुट रहा है तेरा दामन क्या करें ज़ुल्फे शब गों के तसव्वर से भी अब बढ़ रही है दिल की उलझन क्या करें या एलाही खातमा बिलखैर हो जी के अब दुनिया को बदज़न क्या करें शौक है मन्जि़ल का ऐ सफ़वी मगर राहबर भी अब है रहज़न क्या करें (02-01-1959)...

न रो ऐ दिल कहीं ़़़

– ग़ज़ल – न रो ऐ दिल कहीं रोने से तक़दीरें बदलती हैं ज़ियाए रंगो रोग़न से ये तस्वीरें बदलती हैं तुम्हीं ने प्यार बखशा था तुम्हीं ने फेर ली आँखें बहर सूरत मेरे ख्वाबों की ताबीरें बदलती हैं असर अन्दाज़ तो ऐ गर्दिशे अइयाम क्या होगी कहीं तदबीर से क़िस्मत की तहरीरें बदलती हैं न पूछो अहले गुलशन से कि आकर सेहने गुलशन में बदल जाते हैं दीवाने कि ज़नजीरें बदलती हैं मुहब्बत में एक ऐसा वक़्त भी आता है ऐ सफ़वी कि अज़खुद नारसा आहों की तासीरें बदलती हैं (31 दिसम्बर 1959)...