तआरुफ़ ⁄ परिचय

– तआरुफ़ – नाम –           मौलवी मुहम्मद शफ़ी अन्सारी कलमी नाम–   शफ़ी अनवर पैदाइश–         12–08–1940 वल्दियत–      अब्दुल हक़ मरहूम तालीम –        अदीब माहिर, अदीब कामिल, मुन्शी–कामिल– आलिम–फाज़िल, ग्रेजुएट। शायरी के उस्ताद–  मुस्लिम अन्सारी व जालिब नोमानी आग़ाज शायरी–  1960 तखलीक़ात–  सोजो गुज़ार, अफकारे जोनूँ, तस्वीरे वफ़ा,  चिरागे़ वफ़ा, आइने। एलावा अज़ी मौलाना आज़ाद एक अज़ीम शख्सियत और उनका पैग़ाम के उनवान पर किताबचा– उर्दू, फारसी, अरबी, संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेज़ी में। मज़कूरा बाला किताबों पर उर्दू अकादमी और फ़खरुद्दीन अली अहमद मेमोरियल कमेटी की जानिब से एवार्ड मिल चुका है। मुलाज़मत –    रिटायर्ड प्रिन्सिपल, मौलाना आजाद इन्टर कालेज, नथमलपुर, गोरखपुर (यू०पी०)...

राहे वफ़ा में ़़़

– अखलास के गुलाब – राहे वफ़ा में शम्मा जलाते रहेंगे हम नफ़रत की तीरगी को मिटाते रहेंगे हम दीवार जुमल्मो-जौर की ढाते रहेंगे हम अम्नो-अमाँ का ताज बनाते रहेंगे हम बातिल हमारी राह में हाएल हुआ करे सर अपना राहे हक़ में कटाते रहेंगे हम झोंके हज़ार जुल्मो-सितम के चला करें अखलास के गुलाब खिलाते रहेंगे हम दीवार ज़ुल्मतों की खड़ी है तो क्या हुआ अनवर क़दम को आगे बढ़ाते रहेंगे हम...

है उन्हीं मुल्कों का ़़़

– नज़्म : मजलिसे अक़वाम – है उन्हीं मुल्कों का क़ब्ज़ा मजलिसे अक़वाम पर जिनके हाथों में हैं मोहलिक असलहे और मालो-ज़र और मेम्बर तो फ़क़त हैं इस इदारे के गुलाम जक़्स करते हैं इशारे पर उन्हीं के सुब्हो शाम कौन कहता है ये अम्नो-आश्ती का बाग़ है अस्ल में ये दामने-इनसानियत पर दाग़ है ज़ुल्म की ताईद है इसका ओसूले जिन्दगी है मसावातो-अखूवत इसके आगे दिल्लगी हो रहे हैं नातवाँ शहज़ोर के आगे ज़लील कर रहे हैं नातवाँ मुल्कों पे हमले बे दलील ज़अफ़ ईमां का मुसलमाँ हो गया है यूँ शिकार हो रहा है इस जगत में इसलिये रुसवा-वो-ख्वार है नहीं इस्लामियों का कोई अनवर खैर-ख्वाह चाहते हैं सब यही कि क़ौम मुस्लिम हो तबाह...

हिन्द में सब हो गये ़़़

– नज्म – हिन्द में सब हो गये हैं अब तअस्सुब के शिकार दामने जमहूर गुलशन हो गया है तार तार आज भारत के मुसलमाँ का न पूछो हाल ज़ार हैं बड़े मजबूरो–बेकस कसमपुर्सी के शिकार मरहबा तनहाई मेरी आज रौशन हो गई सुब्ह का पैग़ाम लेकर आई शामे इन्तज़ार क़ौमी एकजेहती का नारा किस तरह हो कामयाब बह रहा है जबकि चारों सिम्त बहरे इन्तशार क़ौम से इतना ही मतलब रहबराने क़ौम को चाहते हैं गुल्सिताँ पर अपना अपना एक़तेदार जिस्म का साया भी मुझको अजनबी दिखलाई दे राज़ी रोटी छ्‍िन गई है छ्‍िन गया है रोज़गार कौन है जिसने मेरी सारी मसर्रत छीन ली कौन है जो दिल को रखता है हमेशा बेक़रार जिन्दगी के बाग़ में क्या मुस्कराएं गे गुलाब पाँव से लिपटी है मेरे गर्दिशे लैलो नहार मैं तेरा बन्दा हूँ मुझ पर रहम कर परवर दिगार अपने अनवर को न करना हश्र में रुसवा व ख्वार...