जीवन वृत्त

नाम– बरखूराम भारशिव साहित्यिक नाम– वसन्त साकेती जन्म– 20 अगस्त 1947 शिक्षा– बी०एस०सी०(गणित), बी०एड०, एम०ए०(इतिहास एवं राजनीति शास्त्र) विशेष– हाई स्कूल परीक्षा 1966 में उ०प्र० बोर्ड की मेरिट लिस्ट में छठाँ स्थान। व्यवसाय– मुहम्मद शफी नेशनल इण्टर कालेज हँसवर, अम्बेडकर नगर में 1972 से स्नातक वेतनक्रम में विज्ञान अध्यापक के रूप में अध्यापन एवं 1999 में इतिहास प्रवक्ता के रूप में पदोन्नति प्राप्त कर सम्प्रति इसी पद पर कार्यरत। साहित्यिक आदर्श– प्रख्यात गीतकार श्री गोपालदास नीरज, नव गीतकार स्व०शलभ, श्रीराम सिंह एवं शम्भूनाथ सिंह, भोजपुरी के यशस्वी रचनाकार पं० चन्द्र शेखर मिश्र, शायर डा० बशीर बद्र, स्व० साग़र आज़मी। अभिरुचियाँ एवं उपलब्धियाँ– विविध सांस्कृतिक, सामाजिक एवं शैक्षिक गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता। नैति, राजनैतिक एवं सामाजिक मूल्यों के प्रति संवेदनशीलता। मनोरमा प्राकृतिक सुषमा से अभिप्रेरित होकर साहित्य सृजन में सतत सन्नद्ध। कवि गोष्ठियाँ, अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों एवं मुशायरों के मंचों से आकर्षक काव्यपाठ। अनेक प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं में समय–समय पर रचनाएं प्रकाशित। प्रस्तुत रचना के अतिरिक्त दो खण्ड काव्यों का सृजन प्रगति पर। जीवन पर्यन्त साहित्य सेवा एवं साहित्य साधना का संकल्प। पता– ग्राम–खजुरिया, पो० मजगवाँ, जि० अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश।...

तुम कब आओगे ़़़

– गीत – आये घन कारे परदेशी तुम कब आओगे प्यासे मन की निर्मोही कब प्यास बुझाओगे तुम कब आओगे —– रस गागर छलके आँगन कानन मयूर नाचे पल छ्नि परै न चैन रैन पपीहा पाती बाँचे बीत गई जो ऋतु बहार की फिर पछताओगे तुम कब आओगे —– कब मधुर मिलन की मन में आस बसाये हैं स्वागत में सुरभित सुमनों की सेज सजाये हैं यौवन की पूँजी लुट जाने पर क्या पाओगे तुम कब आओगे —– रूपजाल में कहीं किसी के कन्त न फँस जाना मन मन्दिर के देव मेरे मत मुझको बिसराना भीगे नयन निहारें पथ कब तक तरसाओगे तुम कब आओगे —– संग संग बीते मधुरिम वे दिन याद आते हैं स्वप्न तुम्हारे सुखद सुहाने बहुत रुलाते हैं गाँव गाँव की माटी को कैसे बिसराओगे तुम कब आओगे —– आये घन कारे परदेशी तुम कब आओगे तुम कब आओगे —–...

हम जबसे ़़़

– ग़ज़ल – हम जबसे मजबूर हो गये अपने हमसे दूर हो गये झूठी दौलत ताकत शोहरत मद में सबके चूर हो गये सज्जन तो गुमनाम रह गये दुर्जन अब मशहूर हो गये कत्ल फरेब झूठ मक्कारी ये तो अब दस्तूर हो गये धन कुबेर और बाहुबली जो शातिर थे मशहूर हो गये हमने उनको राह दिखाया पद पाया मग़रूर हो गये एक आपके आने से ही सबके चेहरे पुरनूर हो गये...

इस बरस बरसा न ़़़

– ग़ज़ल – इस बरस बरसा न सावन खेत प्यासे रह गये कल्पनाओं के सजाये ये घरौंदे ढह गये लौट आए याचना के स्वर निठुर आकाश से आस्था आहत हुई सपने सलोने ढह गये रह गये प्यासे नदी नद नहर घट पनघट सभी मलिन मन सूने नयन अन्तर व्यथा सब कह गये श्याम घन ने पी कहाँ की टेर कर दी अनसुनी प्रिय मिलन की आस के पल आँसुओं में बह गये तप रही धरती तवा सी बने घर आँगन अवाँ लहलहाते धान खेतों में झुलस कर रह गये...

महुआरी मधुरस छलकाये ़़़

– गीत – महुआरी मधुरस छलकाये फागुन में मस्त पवन मकरन्द लुटाये फागुन में मस्त पवन मकरन्द —– विदा विरस पतझार मदिर मौसम आया वासन्ती आँचल धरती का लहराया बंसवारी बाँसुरी बजाये फागुन में मस्त पवन मकरन्द —– महके घर ऑगन विहँसे केसर क्यारी लहके अरुण पलाश जरे तन चिनगारी कोयल राग विहाग सुनाये फागुन में मस्त पवन मकरन्द —– झनके झाँझ मजीरा झूमे सब अमराई झरे फुहार मदन रस मादकता छाई चन्द्र किरन तन तयन बढ़ाये फागुन में मस्त पवन मकरन्द —– पिंहके रात पपिहरा प्रिय की प्रीति जगे खुनक उठे कर में कंगन तन मन उमगे परदेशी प्रिय कन्त न आये फागुन में मस्त पवन मकरन्द —–...