ये भ्रमर गुलसितां में ़़़़़

ये भ्रमर गुलसिता में रहे ना रहे शोख खुश्बू हवा में रहे ना रहे हर घड़ी को समझ बस यहां आखिरी कल तु जिन्दा जहां मे रहे ना रहे जिन्दगी के मजे लूट ले बेसबब चांदनी फिर निशा में रहे ना रहे आज ही मांग ले जो तमन्ना है वो कल को बरकत दुआ में रहे ना रहे नेह कर ले जमाने से बनके सुघर क्या पता मन फेजा में रहे ना रहे दिल की बातों का इजहार कर ले सनम कल ये साहस जुबॉ में रहे ना रहे...

ये भ्रमर गुलसितां में ़़़़़

——– ग़ज़ल ———— ये भ्रमर गुलसिता में रहे ना रहे शोख खुश्बू हवा में रहे ना रहे हर घड़ी को समझ बस यहां आखिरी कल तु ज़िन्दा जहां मे रहे ना रहे ज़िन्दगी के मजे़ लूट ले बेसबब चांदनी फिर निशा में रहे ना रहे आज ही मांग ले जो तमन्ना है वो कल को बरक़त दुआ में रहे ना रहे नेह कर ले जमाने से बनके सुघर क्या पता मन फ़ेजा में रहे ना रहे दिल की बातों का इज़हार कर ले सनम कल ये साहस ज़ुबॉ में रहे ना रहे...

जीवन वृत्त

नाम- विवेक त्रिपाठी पिता का नाम- डॉ0 देवेंद्र दत्त त्रिपाठी माता का नाम – श्रीमती सुधा त्रिपाठी जन्मतिथि – 15-08-1994 शैक्षिक योग्यता- बी.एस.सी.(जीव विज्ञान) सम्बद्धता- प्रगतिशील लेखक संघ साहित्य गुरु- कवि आर्य हरीश कोशलपुरी स्थाई पता- ग्राम-मानापुर, पोस्ट-रामनगर, जिला-अम्बेडकर नगर (उ.प्र.)भारत पिनकोड -224181 ई–मेल- vivektripathi341@gmail.com मोबाइल नं0- +919648353231, +917053854664...

आदमी बेकार होता ़़़

– ग़ज़ल – आदमी बेकार होता जा रहा राह का अख़बार होता जा रहा नफ़रतें लायीं हैं परदेसी हवा मतलबी संसार होता जा रहा जल रहा इंसान अब इंसान से जुल्म का अंगार होता जा रहा झूठ पसरा है ज़हा में इस तरह सच से ही इनकार होता जा रहा कामनायें बढ रही है जीस्त में फ़िक्र पर अधिकार होता जा रहा देखता तक्सीम होते देश को दूर अब घर बार होता जा रहा...

जिसे भेंट श्रद्धा ़़़

                ग़ज़ल जिसे भेंट श्रद्धा सुमन कर रहा था वही देश पूरा हवन कर रहा था मैं जिसके लिये ला रहा था उजाला वही घोर तम का सृजन कर रहा था बुलाती जिसे गाँव की मुशिकलें थीं वो दिल्ली में बैठा भजन कर रहा था सदा डाह रखता ज़माने से जो था ज़माना उसी को नमन कर रहा था बदलने चला था जो बिगड़े चलन को वही सभय़ता आचमन कर रहा था...