दिल की आवाज पे गा सोई मुहब्बत को जगा
एक नया राग सुना दिल की इनायत को जगा
ताकि दुनिया को रहे याद फसाने की कसक
तुझपे इल्जाम न हो कुछ भी हकीकत को जगा
दिल की आवाज से निकले हुए ये अल्फाज मुहब्बत के सदके में कभी सबा घन्टाघरी मौका मिलने पर कहीं भी गुनगुंना लिया करते थे। आज भी किसी बैठक से निकलते वक्त सबा साहब यही लाइनें गुनगुना रहे थे। उनके इसी अन्दाज पर रफीक जगतबेलवी साहब ने कहा- क्या कहने सबा साहब, वाह, मुहब्बत की खातिर क्या नज़राना पेश किया है आपने, खुदा सलामत रखे ये अन्दाजे बयाँ। रफीक जगतबेलवी साहब ने मुशायरों से तौबा कर लिये अपने दोस्त शाकिर खलीलाबादी साहब का यह शेर तरन्नुुम में मुहब्बत के नाम पर पेश करते हुए पढ़ा-
मुहब्बत करो बिन किये धीरे धीरे
तराना पढ़ो बिन लिखे धीरे धीरे
ेकहीं शामे गुरबत पकड़ ले न दामन
खुशी में जियो बिन जिये धीरे धीरे
रहीम मगहरी जो कभी फिल्मी दुनिया में असिस्टेन्ट गीतकार हुआ करते थे, अपनी एक मशहूर ग़ज़ल पर गीत लिखकर उन्होंने फिल्म के लिये दे दिया था, उसमें भी मुहब्बत का पैग़ाम था और वो गीत था-
अपने लिये जिये तो क्या जिये
तू जी ऐ दिल जमाने के लिये
अपने लिये जिये तो —–
दोस्तो मुहब्बत पर बेशुमार नज्मे, ग़ज़लें लिखी गयीं, बेशुमार शेर कहे गये जो लोगों की जुबान पर आज भी जिन्दा हैं। बहुत से लोग बातें करते वक्त शेर का इस्तेमाल भी करते हैं। किसी ज़माने में चिलमन मगहरी साहब भी इश्क फरमाते थे और इसी की खातिर उन्होंने अपने एक नाकाम शायर दोस्त हफीज खलीलाबादी की मदद से शायरी करना भी सीखा था। एक जगह वो फरमाते हैं-
जो अहले क़लम हैं वही मानते हैं
कि सदके मुहब्बत के हम जानते हैं
मुहब्बत के ग़म से जो लिखते हैं नग़मे
वही इश्क़ की सरज़मी छानते हैं
हमीद जगतबेलवी साहब भी मुहब्बत के नाम नज़राना पेश करते हुए एक जगह फरमाते हैं-
देखना इश्क के अपने भी ज़माने होंगे
हर जगह सिंर्फ मुहब्बत के फसाने होंगे
लोग गायेंगे सुनाएंगे यही अफसाना
मेरे अल्फाज़ यही इश्क़ के माने होंगे
एक नादान शायर थे सलाम घंटाघरी, उनके चेहरे से हमेशा इश्क टपकता था, उनका लेहजा भी बड़ा आशिकाना था, पेशा तो उनका वकालत का था, मगर जज़बाती बहुत थे, अपनी धड़कनों को रोक नहीं पाते थे, जब कभी फुर्सत मिलती अपनी हम खयाल को अपने दिल की बात सुना दिया करते। सलाम साहब फरमाते हैं-
आओ कुछ बात करें यार सँभलने के लिये
इश्क के नाम तबीयत को बहलने के लिये
दिन तो कुर्बान ही करते हैं यहाँ और वहाँ
शाम आई है कहो दिल की मचलने के लिये
मुहब्बत के सताये हुए अपनी बेगम के दुलारे कामचोर शायर नाकाम गोरखपुरी अजीबो गरीब हरकतें किया करते थे, अपनी हर बात इशारों के साथ कहते थे। मुहब्बत का ग़म उन्हें भी था और उसी अन्दाज में उन्होंने अपने दिल की आवाज को कुछ इस तरह से बयान किया-
गम की वादी है चलो आज इसें पार करें
रुत सुहानी है यही सोच के इज़हार करें
प्यार की रस्म नई सोच ज़माने में चले
आओ इस बात पे ख़त लिख के ज़रा प्यार करें
मुहब्बत के ग़म को समझाते हुए एक लाचार और बेसहारा शायर सन्दल डोमिनगढ़ी जो तमाम मुशायरों में लगातार शिरकत करने के बाद यहाँ तशरीफ लाये हैं। अपने अन्दाज़ में कहते हैं-
इश्क़ में हमनशीं अब तलक जी लिये
प्यार के नाम का जाम तक पी लिये
अब ज़माने का ग़म है न डर रात का
तन बदन इश्क़ के नाम कर ही लिये
कामचोर और निकम्मा का तमग़ा पाए हुए एक बेतकल्लुफ शायर हुए हैं बेकल आज़मी जिन्होंने मुहब्बत के दर्द को यूँ बयाँ किया है-
बहुत खूबसूरत समा है सुहाना
फ़ेज़ा बन गई है बड़ी दिलरुबाना
तमन्ना यही है हवा बन के छू ले
तेरा ग़म मुझे कर रहा आशिकाना
जब तक दुनिया रहेगी, इन्सान रहेंगे तब तक मुहब्बत भी ज़िन्दा रहेगी। भले ही इन्सान की सोच बदल जाये या मुहब्बत का रूप बदल जाये। इसी मुहब्बत को ज़िन्दा रखते हुए ज़िन्दादिल शायर नसीम जगतबेलवी फरमाते हैं-
रात का ग़म है खयालों को जगाए रक्खो
प्यार का दर्द भी आए तो दबाए रक्खो
इश्क नाकाम न हो जाये संभालो खुद को
हौसला सुब्ह तलक और बढ़ाए रक्खो
दोस्तो अब मैं आपकी मुलाक़ात सबकी धुकधुकी तेज़ करने वाले एक ऐसे कवि से कराने जा रहा हूँ जो कई भोजपुरी फिल्मों में अपना गीत दे चुके हैं और वो हैं भोजपुरी के चकाचक कवि रामसरुप बाँवरा। कविता के क्षेत्र में लोग उन्हें बाँवरा नौसढ़ी भी कहते हैं। आज आप उन्हें सुने। माइक पर बाँवरा नौसढ़ी-
अध्यक्ष महोदय से अनुमति चाहते हुए भोजपुरी की चार लाइनें आपकी सेवा में पेश कर रहा हूँ, आशीर्वाद चाहूँगा-
मन के भीतराँ सपनवाँ जगइले र ह
सबसे आपन सनेहिया बनइले र ह
के हु बाउर कहै चाहे निम्मन कहै
थोड़ जिनगी बा सबके मिलइले र ह
श्रोता बन्धु अब मैं आपके सामने एक गजल पेश करना चाहता हूँ आप इसे भी सुनें और आशीर्वाद दें-
जिनिगिया ई ओकर जो मेहमान होती
त निम्मन जवनिया इ धनवान होती
न झाँसा में अइतीं मिसराइन के कब्बो
पिरितिया के जियरा में घमसान होती
तमासा देखइतीं फसिलिया उगा के
कविताइन सिवनवाँ के हलकान होती
सपनवाँ के खेतवा में जाके सजइतीं
किलंहटी अ कौवा के पहचान होती
दलिद्दर के गउवाँ से लामे भगइतीं
त निबिया के छहवाँ भी वरदान होती
मड़इया के जंगला से गितिया सुनइतीं
पड़ोसिन कोइलिया भी हैरान होती
सनेहिया जगइतीं ई सबके पिया के
बजरिया में लपसी की दूकान होती
फिल्मों की बात न की जाये तो यह लेख अधूरा रह जायेगा। फिल्मों में भी अनेक शायरों और कवियों ने अपना-अपना सराहनीय योगदान दिया है। मुहब्बत के नाम पर एक से बढ़ कर एक गीत लिखे गये हैं जिन्हें सुनकर ऐसा लगता है कि ये गीत वास्तव में हमारे लिये ही लिखे गये हैं। इन गीतों की ताज़गी आज भी जवान है जो हर उम्र के लोगों पर फिट बैठती है। आप भी सुनें-
प्यार का तराना बना ले दिल दीवाना
प्यार का तराना बना ले दिल दीवाना
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें
प्यार का तराना बना ले ………….
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Nazar Maghari