by Nazar | Oct 2, 2015 | Pt. Suresh Sharma
नाम – पं० सुरेश शर्मा जन्म – 10 अप्रैल 1966 सम्मान – (1) दलित साहित्य अकादमी गोरखपुर (2) उत्कर्ष सांस्कृतिक मंच आलापुर पुस्तकें – (1) विषधर (उपन्यास) (2) सतीत्व और शराब (नाटक) (3) काव्य संग्रह – 3 (प्रकाश्य) (4) विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित होती रहती है। पता – ग्राम–रामपुर इण्डी पिण्डी, पोस्ट–शिवतारा (बसखारी),जिला–अम्बेडकर नगर, उ०प्र० मोबाइल सं० 09628845503...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Pt. Suresh Sharma
– गीत – कभी विधर्मी ने लूटा और लूटा कभी फिरंगी ने आज वतन को लूट लिया नेता बनके शिखण्डी ने कभी विधर्मी ने लूटा —– चपरासी के योग्य नया बनकर बैठा अधिकारी है पापी कामी अधर्म नीच परमेश्वर का पुजारी है न्याय धर्म का मर्म न जाना न्यायाधीश आनन्दी ने कभी विधर्मी ने लूटा —– जरासन्ध धृतराष्ट्र कंस रावण की तानाशाही है कहने को है प्रजातन्त्र पर सच में नौकरशाही है जयचन्दों की जय–जय है अब राजनीति की मण्डी में कभी विधर्मी ने लूटा —– सरकारी वर्दी में गुन्डे अब तो अच्छे लगते हैं हिटलर थामस डलहौजी नाज़ी के बच्चे लगते हैं अन्तर ध्यान धर्म हो गया न्याय की नव नसबन्दी में कभी विधर्मी ने लूटा —– मैकाले की शिक्षा व्यवस्था का करता सम्मान है देवनागरी वैदिक विद्या का करता अपमान है शिक्षा का व्यवसाय किया है बुद्धिहीन बहुरंगी ने कभी विधर्मी ने लूटा —– प्रजातन्त्र का जाल बिछाया राजनीति का ज्ञानी है तन्त्र हुआ आबाद यहाँ जनगण की दुखी कहानी है देश किया नीलाम सुरेश उस जन नायक पाखण्डी ने कभी विधर्मी ने लूटा —–...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Pt. Suresh Sharma
– गीत – चर्चा चारों ओर है फैली राजनीति दुखदायी है जन नायक के बदन से निकली बेशर्मी बेहयायी है चर्चा चारों ओर है फैली —– वातानुकूल कमरे में बैठा नेता मौज उड़ाता है सीमा का प्रहरी सरहद पर शान में जान गँवाता है खून पसीने की उपजाई कृषक की सस्ती कमाई है चर्चा चारों ओर है फैली —– हत्या दंगा चोरी चकैती सबका सृजनहार है हवस में अन्धा गोरख धन्धा पाप का पालनहार है दया धर्म की बातें करता मन मनहूस कसाई है चर्चा चारों ओर है फैली —– अन्न का मेरे दाम लगाता जैसे खेत उसी का है वेतन है हर साल बढ़ाता जैसे देश उसी का है कहता बजट में घाटा आया इसीलिये मँहगाई है चर्चा चारों ओर है फैली —–...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Pt. Suresh Sharma
– गीत – कौतूहल से मुक्त हो जाये धरा संसार की स्वर्ण सी लगने लगे अनुपम धरा संसार की काले गोरे का कलुषमय भेद मिट जाये सभी शक नहीं मिट जायेगी सारी व्यथा संसार की जाति धर्म भेद का उलझा हुआ सवाल है गर सुलझ जाये पहेली लगे धरा सुरधाम सी व्योम की छाया तले जी रहा संसार है मेदनी से प्राण पाया परम्परा पाषाण की शान्ति का अर्क कब ज्योतिर्गमय होगा बन्धुओं आस इकलौती पुरानी है व्यथा संसार की जग आकांक्षी शान्ति का शान्ती सद्भाव की सुरेश जीवन नीर सा गतिबद्ध हो हर जानकी...