गीत

कौतूहल से मुक्त हो जाये धरा संसार की

स्वर्ण सी लगने लगे अनुपम धरा संसार की

काले गोरे का कलुषमय भेद मिट जाये सभी

शक नहीं मिट जायेगी सारी व्यथा संसार की

जाति धर्म भेद का उलझा हुआ सवाल है

गर सुलझ जाये पहेली लगे धरा सुरधाम सी

व्योम की छाया तले जी रहा संसार है

मेदनी से प्राण पाया परम्परा पाषाण की

शान्ति का अर्क कब ज्योतिर्गमय होगा बन्धुओं

आस इकलौती पुरानी है व्यथा संसार की

जग आकांक्षी शान्ति का शान्ती सद्भाव की

सुरेश जीवन नीर सा गतिबद्ध हो हर जानकी

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