by Nazar | Oct 2, 2015 | Dr. Ishwar Chandra Tripathi
नाम- डॉ० ईश्वर चन्द्र त्रिपाठी पिता का नाम- स्व0 सत्यनारायण त्रिपाठी माता का नाम- स्व0 ब्रह्मा देवी जन्मतिथि- (02-07-1968) दो जुलाई उन्नीस सौ अरसठ पता- ग्रा० व पो०- महगूपुर धाहर, जनपद-आजमगढ़ पिनकोड-223223 शैक्षिक योग्यता- एम0ए0 (हिन्दी), एम0 एड0, पी-एच0डी0 व्यवसाय- अध्यापन, (प्रशिक्षण विभाग)श्री दुर्गा जी स्नातकोत्तर महाविद्यालय चण्डेश्वर, आजमगढ़ उ०प्र० प्रकाशित कृतियाँ- (1) शकुन्तला (भोजपुरी खण्डकाव्य) (2) दमयन्ती (भोजपुरी खण्डकाव्य) (3) न तो कश्ती मिली, न किनारा मिला (मुक्तक संग्रह) (4) तुम भी इसी शहर में, हम भी इसी शहर में (ग़ज़ल संग्रह) (5) दर्द का व्याकरण नहीं होता (मुक्तक संग्रह) पुरस्कार- उ0प्र0 हिन्दी संस्थान द्वारा भोजपुरी खण्डकाव्य शकुन्तला पुरस्कृत। सम्मान- अन्तर्राष्ट्रीय भोजपुरी संगम में महामहिम राज्यपाल द्वारा अलंकृत। प्रकाशन- देश की विभिन्न पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशन। प्रसारण- आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों से प्रसारण। ई0 मेल- IshwarTripathi@gmail.com वेबसाइट- www.drishwar.com मोबाइल नं0- 9455885866...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Dr. Ishwar Chandra Tripathi
मुस्काना जब भी चाहे, रूलाये गये है हम हँस-हँस के याद भुलाये गये हैं हम, कैसे बतायें कितना सताये गये हैं हम। क़ुदरत का करिश्मा है कि हम सामने खड़े, वरना हज़ार बार मिटाए गये हैं हम। अपनों ने मुझे बेंचा है, गैरों ने खरीदा, हर रोज़ ख़जाने से चुराये गये हैं हम। मत जि़न्दगी के जश्न की तस्वीर माँगिये, मुस्काना जब भी चाहे, रूलाये गये हैं हम। ऐसे चिराग़ जिसमें की बाती न तेल है, तूफान में बेख़ौफ जलाये गये हैं हम। श्मशान पर जब आँख खुली तो समझ गये, करने के लिए क़त्ल जिलाये गये हैं हम।...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Dr. Ishwar Chandra Tripathi
मुक्तक (कतात) (1) सत्य पर आवरण नहीं होता वक्त का आचरण नहीं होता आसुओं ने बताया आॅखों को दर्द का व्याकरण नहीं होता। (2) फिर मुझे याद कर रहा कोई वक्त बरबाद कर रहा कोई अपनी परिभाषा देके लौटा है मेरा अनुवाद कर रहा कोई। (3) खुद से अनबन सी हो गयी मेरी सास दुश्मन सी हो गयी मेरी बर्फ की आग में जला जबसे देह कुन्दन सी हो गयी मेरी। (4) अपनी पहचान लेके भेज दिया, हाथ में जान लेके भेज दिया। भूख ने मुझको साॅप के घर में, बीन की तान लेके भेज दिया। (5) मुस्कुराये कभी मलीन हुए बहते पानी के आबगीन हुए। जिन्दगी बन के तमाशा गुजरी, और हम खुद तमाशबीन हुए।...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Dr. Ishwar Chandra Tripathi
असली चेहरा-नक़ली चेहरा देख लिया कफ़न बँधा मैंने इक सेहरा देख लिया, असली चेहरा-नक़ली चेहरा देख लिया। घर की दीवारों को जबसे कान हुए, इन्सानों को गूँगा-बहरा देख लिया। मिट्टी के कारिन्दे सोने की ख़न्जर, आँखों के पहरों पर पहरा देख लिया। घूँघट में ज्वालामुखियाँ, लहरों में लपटें, दिल को सागर से भी गहरा देख लिया। तुम भी मेरे साथ चढ़ोगे शूली पर, मैंने भी क्या ख़्वाब सुनहरा देख लिया।...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Dr. Ishwar Chandra Tripathi
गंगा-यमुना का आलिंगन रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने तेरी साँसे मेरी धड़कन, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने, गंगा-यमुना का आलिंगन, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने। गंगा-यमुना का आलिंगन……………….। तुम रूप नगर में रहते हो, मैं चित्र बनाने वाला हूँ। सूरज और चाँद-सितारों को, धरती पर लाने वाला हूँ। रूक जाओ अभी दो पल ही सही, मैं खुद ही आने वाला हूँ। तेरा-मेरा ये आकर्षण, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने।। गंगा-यमुना का आलिंगन……………….। सावन की घटा, फागुन की छटा, ऋतुओं का दौर नया होगा, पदचिन्ह निहार रहा हूँ मैं, तुम सा भी कोई गया होगा। तुम मान गये तो, जग माना, तुम रूठ गये तो क्या होगा।। तेरी बहकी-बहकी चितवन, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने। गंगा-यमुना का आलिंगन……………….। देखो न मुझे हसरत की नजर, मैं अपने में अलबेला हूँ, उठते-गिरते मृदु भावों का, इक चलता-फिरता मेला हूँ। राही तो बहुत गुजरे हैं मगर, इस पथ पर आज अकेला हूँ, साँसो-साँसों का ये बन्धन, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने। गंगा-यमुना का आलिंगन……………….।...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Dr. Ishwar Chandra Tripathi
सृजन करता जा रहा हूँ सृजन करता जा रहा हू सृजन करता जा रहा हूँ। देखता हूँ टूट करके बिखरता है हर खिलौना, फिर भी किसके वास्ते सजता-संवरता जा रहा हूँ ? सृजन करता………………। एक अन्जाने मुसाफिर की तरह कुछ गीत लिखकर एक चैराहे से आकर दूसरे पर रूक गया हूँ। पूछते हैं जब सभी परिचय हमारा पास आकर, तब बताता हूँ कि मैं कल था नया, अब भी नया हूँ। क्या बताऊँ और जब इस जि़न्दगी के रास्ते पर एक क्षण बनता हूँ अगले क्षण बिखरता जा रहा हूँ। सृजन करता……………..। एक पखवारा अन्धेरों से लिपट कर हमने देखा चाँद काला हो गया है। बुझ रहा है रोज सूरज राख बनकर पवन वीरानों में जाकर सो गया है।। जब प्रलय प्रतिबिम्ब आँसू में उभरते जा रहे हैं सोचता हूँ फिर भी मैं क्यों आह भरता जा रहा हूँ सृजन करता…………………। दुध मुँहे संगीत, यौवन छू न जाये गगन की दीवार बोझिल हिल रही है। पीस कर मुट्ठी में मेंहदी का कलेजा रोज सूरज को चुनौती मिल रही है।। खाँसती है उम्र जब करवट बदलकर काल हँसता सोचता हूँ पग बढ़ाकर क्यों ठहरता जा रहा हूँ ? सृजन करता…………………..।...