गंगा-यमुना का आलिंगन रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने

तेरी साँसे मेरी धड़कन, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने,
गंगा-यमुना का आलिंगन, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने।
गंगा-यमुना का आलिंगन……………….।

तुम रूप नगर में रहते हो, मैं चित्र बनाने वाला हूँ।
सूरज और चाँद-सितारों को, धरती पर लाने वाला हूँ।
रूक जाओ अभी दो पल ही सही, मैं खुद ही आने वाला हूँ।
तेरा-मेरा ये आकर्षण, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने।।
गंगा-यमुना का आलिंगन……………….।

सावन की घटा, फागुन की छटा, ऋतुओं का दौर नया होगा,
पदचिन्ह निहार रहा हूँ मैं, तुम सा भी कोई गया होगा।
तुम मान गये तो, जग माना, तुम रूठ गये तो क्या होगा।।
तेरी बहकी-बहकी चितवन, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने।
गंगा-यमुना का आलिंगन……………….।

देखो न मुझे हसरत की नजर, मैं अपने में अलबेला हूँ,
उठते-गिरते मृदु भावों का, इक चलता-फिरता मेला हूँ।
राही तो बहुत गुजरे हैं मगर, इस पथ पर आज अकेला हूँ,
साँसो-साँसों का ये बन्धन, रूक जाये कहाँ कोई क्या जाने।
गंगा-यमुना का आलिंगन……………….।

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