by Nazar | Oct 2, 2015 | Ayodhya Prasad Vikal
नाम – अयोध्या प्रसाद साहित्यिक नाम – विकल विड़हरी जन्म – 28 फरवरी 1939 पिता – श्री सुखराज कार्य – अध्ययनोपरान्त कृषि कार्य पता – ग्राम व पोस्ट–बिमावल (रामनगर),जिला–अम्बेडकर नगर, उ०प्र०...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Ayodhya Prasad Vikal
– जीतल महिला प्रधान – सुनिल्या ये पप्पू के बाबू भल घूमत रह्या फुटानी में अब हम घूमब तब पता लगी जीतल बाटी परधानी में अब हम घूमब तब पता लगी जीतल बाटी —- हम पंचइती में जाबे जब तब लड़िकन के बहकाया तू पंचइती से जब घर अइबै तब पानी हमें पिलाया तू कंचित अबेर होइ जाय हमें तब चउका चूल्ह जगाया तू हम आइ जाब रोटी बेलब चट रोटी बैठि सेंकाया तू हम चाहे आइब जाब जहाँ तू मत घूम्या निगरानी में अब हम घूमब तब पता लगी जीतल बाटी —- मीटिंग में कोर्ट कचहरी में साइकिल से हमें पठाया तू हम आगे आगे चलत रहब बस्ता लै पाछे धाया तू हम भाग लेब जब मीटिंग में तब चाय समोसा खाया तू मीटिंग समाप्त होइ गइले पर फिर घर हमकै ले आया तू अब राजनीति हमहूँ करबै राखल बा काव किसानी में अब हम घूमब तब पता लगी जीतल बाटी —- शौचालय गोबर गैस और नाली पुलिया बनवइबै हम सुन्दरीकरन में गाये कै बड़का पोखरा झरवइबै हम गड़ही गड़हा बा जहाँ तहाँ समथर ओके करवइबै हम हर गली कै कचरा दूर करब ईंट सब पर बिछवइबै हम सब झूरे घर आई जाई केहू पाँव धरी न पानी में अब हम घूमब तब पता लगी जीतल बाटी —- कहि लेखपाल से गायें कै सगरो चकरोड पटवइबै हम सूअर मुर्गी मछली पालन जे चाही उसे देवइबै हम बंजर कै होई भूमि जहाँ पट्टा आके कै नइबै हम गाँयें कै झगड़ा छोट मोट–सब घर ही पर निपटइबै हम समझाइ के राखब सबही के जाये न देब दिवानी में अब हम घूमब तब पता लगी जीतल बाटी —- महिला का हमें समझला...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Ayodhya Prasad Vikal
– कवि सम्मेलन – सच कहता हूँ सच ही कहने से कितनों से बिगाड़ हो गया आज काल्ह कवि सम्मेलन भी नौटंकी और भांड हो गया आज काल्ह कवि सम्मेलन भी नौटंकी और — स्वर स्वरूप की पूजा होती कांच कौन पहचाने मोती श्रोता पलई मार रहा है मानों छुटहर साँड़ हो गया आज काल्ह कवि सम्मेलन भी नौटंकी और — अलंकार रस छन्दादिक अब नयी विधा में हैं बाधित सब संचालक भी बना विदूषक कहता तिल का ताड़ हो गया आज काल्ह कवि सम्मेलन भी नौटंकी और — पैसे पर हम नाच रहे हैं गैर की कविता बाँच रहे हैं मंचों पर जम जाते ऐसे जैसे चोटा खांड हो गया आज काल्ह कवि सम्मेलन भी नौटंकी और — ‘विकल‘ अकल से काम लीजिये मंचों पर तब नाम दीजिये जान लीजिये जबकि अपना कोई सही जुगाड़ हो गया आज काल्ह कवि सम्मेलन भी नौटंकी और —...
by Nazar | Aug 11, 2015 | Ayodhya Prasad Vikal
– गीत – दुखों के दिन मिलते हैं तो सुखों के दिन भी मिलते हैं सरोवर सूखे रहते हैं तो कभी शतदल भी खिलते हैं जब शिशिर के आतंकों से जल–थल ठरने लगते हैं आहत रसाल के पत्ते भी तब झरने लगते हैं पत्ते विहीन होकर टेसू नंगे दिखलाते हैं मंटक मय बन जाते गुलाब पत्ते झर जाते हैं पशु पक्षी सभी ठिठुर करके ठंडक से हिलते हैं संध्या को पूरब प्रात सभी पश्चिम से मिलते हैं आकर बसन्त सबको फिर से नवजीवन देता है हरियाली से भर देता सबका दुख हर लेता है बौराते हैं रसाल के तरु गुलाब खिल जाते हैं नाचती तितलियां फूलों पर भौंरे मडराते हैं पत्ते विहीन टेसू पाकर नव लाली खिलते हैं सुखों के दिन भी मिले हैं दुखों के दिन भी मिलते हैं जब ग्रीष्म के झंझावातों को लू लेकर चलता है अवनी तल का कणकण तृण् तृण सब जलने लगता है पशु पक्षी व्याकुल तृष्णा से अकुलाने लगते हैं अरु हरे–भरे तरुवर भी सब मुरझाने लगते हैं जल से परिपूर्ण सरोवर भी सूखे बन जाते हैं मानो मरुस्थल के चादर भी उन पर तन जाते हैं आती है वर्षा ऋतु नभ में बादल घिर जाते हैं होती है वर्षा सभी नदी नाले भर जाते हैं शीतल हो जाती विकल धरा हरियाली छाती है सुखमय प्राणी फिरते हैं अरु खेती लहराती है भरते हैं सरोवर जल से फिर शतदल भी खिलते हैं सुखों के दिन भी मिलते हैं दुखों के दिन —–...