by Nazar | Oct 2, 2015 | Soond Faizabadi
नाम– दान बहादुर सिंह साहित्यिक नाम– सूँड़ फैजाबादी जन्म– 01 अगस्त 1928 जन्म स्थान– अलऊपुर, जिला–फैजाबाद (उ०प्र०)(अब अम्बेडकर नगर) पिता– श्री रामकरन सिंह शिक्षा– हाई स्कूल – श्याम सुन्दर सरस्वती विद्यालय, फैजाबाद इन्टरमीडिएट – शिबली नेशनल कालेज, आजमगढ़ बी०ए० तथा एम०ए० – आगरा विश्वविद्यालय कार्य– 1947 से एस०के०पी० इन्टर कालेज, आजमगढ़ (उ०प्र०) कविता का आरम्भ– कक्षा 9 से, हिन्दी अध्यापक पं० बलभद्र द्विवेदी की प्रेरणा से हास्यरस की ओर झुकाव। काव्य गुरु– कविवर विश्वनाथ लाल शैदा एडवोकेट, आजमगढ़। रचनाएं– (1) मियां की दौड़ (1949) (2) फुंकार (1951) (3) अंग्रेजी गीतों का हिन्दी रूपान्तर (1953) (4) लपेट (1956) (5) चपेट (1971)...
by Nazar | Aug 15, 2015 | Soond Faizabadi
– तुम्हारे बिना – लगता नहीं फागुन में मन टेस्ट मैच हो गया जीवन तुम्हारे बिना बाग और बगीचे में खुशियों का अपहरण फिल्डिंग करता वातावरण धड़क रही खिड़की किन्तु द्वार शम–दम घर लगता स्टेडियम दर्शक दीवानों में कौतुक उभरा पिच लगता बिस्तरा बालिंग के नये अन्दाज सजग बल्लेबाज भटक रहा गें सा यौवन तुम्हारे बिना कोकिल पपीहे सब सुना रहे कमेन्टरी बिरहा बना रहा सेन्चुरी मधुर टीस मार रही छक्के छूट गये धीरज के छक्के चौका लगा रही वेदना मन होता अनमना पवन बार–बार करे शोर बढ़ता स्कोर पहरे पर पुलिस पलाशवन तुम्हारे बिना मन हुआ कैच आउट अभिलाषा रन आउट मिलन एल०बी०डब्लू० हुआ इच्छा को फ्लू आ आ क्लीन बोर्ड हो गया अनुमान घबड़ाया कप्तान बच गया फालोआन फिर भी उदासी सुना होगा तुमने भी मेरे ब्रजवासी रन को टटोल वह सात मधुबन टेस्ट मैंच हो गया जीवन तुम्हारे बिना ।...
by Nazar | Aug 15, 2015 | Soond Faizabadi
मेरे बाप हे मेरे परम पूजनीय बाप आखिर कब मरेंगे आप यदि आप अभी मर जाते बेटे पर उपकार कर जाते रिटायर होने के बाद आप बीस वर्षों से लगातार जी रहे हैं रोजाना एक किलो दूध पी रहे हैं सरकारी दूकान का सारा राशन आप ही खा रहे हैं हम तो महाभारत की लड़ाई में जूझ रहे हैं आप रामायण गा रहे हैं हम उधारी के लिये दर–दर दाँत दिखा रहे हैं आप बैठे–बैठे नकली दाँत बजा रहे हैं बेवजह, बे मतलब शारे कर रहे हैं हम लोगों को क्यों बोर कर रहे हैं मेरे ऊपर घर के बारह सदस्यों का भार है ऊपर से आप का भूत सवार है और तो और लकड़ी भी बाजार से गायब हो गई कफन का दाम रोजाना बढ़ रहा है कर्ज का बोझ बार–बार चढ़ रहा है यदि साल दो साल आप और रह जायेंगे सच मानिये हम मर जायेंगे आप के साथी संघाती कभी के चले गये मगर आप खार खाए बैठे हैं हमें मालूम है आप के चमचे यमराज के कार्यालय में बैठे हैं कुछ दे दिलाकर आप ने अपनी फाइल गायब कराई है जीने के लिये कैसी बेहयाई है हे मेरे बच्चों के दादा सपरिवार प्रार्थना करता हूँ हाथ जोड़ता हूँ पाँव पड़ता हूँ हम सब पर कृपा करें आप शीघ्र से शीघ्र मरें आप हे मेरे बाप ।...
by Nazar | Aug 15, 2015 | Soond Faizabadi
चुम्बन और झापड़ गली के मोड़ पर एक आलीशान दुकान तीन ग्राहक विद्यमान– वृद्धा, तरुणी, जवान सामानों के बी उलझा हुआ दूकानदार चल रहा लेन–देन बात व्यवहार अचानक बिजली गुल हुई ज्योति उड़ी, धुआँधार निविड़ अन्धकार स्याही में सभी डूबने लगे अन्धेरे में जवान को सूझा मजाक एक प्यारा उसने अपने हाथ का चुम्बन लिया दूकानदार को एक झापड़ मारा चुम्बन और झापड़ गूँज उठा यों लाभ और घाटा लड़खड़ा उठा सन्नाटा बुढ़िया सोचने लगी चरित्रवती युवती ने उचित व्यवहार किया चुम्बन का झापड़ से जवाब दिया तरुणी सोचने लगी हाय रे मूर्ख नादान, अजनबी, अन्जाना मुझे छोड़ कर बुढ़िया पर मर मिटा बेचारा अनायास पिटा और दूकानदार पछताता हुआ अपना गाल सहलाता हुआ सोच–सोच कर रहा है गम चुम्बन किसने लिया हाय पिटे हम...