by Nazar | Aug 15, 2015 | Dwij Chhotkun Shukl
– चौताल – एक ठाढ़ि विरिछ तर नारी विरोग की मारी कि तोर सास ससुर रिसियाने घर से दीन निकारी कि सैंया दूर देशवा में छाये याकि काम अनल तन सारी विरोग की मारी —– हे सखि सास ननद हैं मैं तो दिनन की वारी बिन पिय कौन हरत दुख तनका मोहि छोड़ि विदेश सिधारी विरोग की मारी —– तब तौ रहयों में वारी लरिकवा, अब तो जुवा हमारी अंग अनग सतावन लागे हों दोऊ जोवन मारे कटारी विरोग की मारी —– सुनो सयानी अन्तर जानी पियवा सुरति बिसारी द्विज छोटकुन पिय वेगि मिलावत मोरि हिय की तपनि निवारी विरोग की मारी —– ––– (100 वर्ष पूर्व के रचनाकार हैं, अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं...