by Nazar | Oct 2, 2015 | Baledeen Besahara
नाम – बालेदीन बेसहारा पिता का नाम – स्व० जगदेव यादव (स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी) पता – ग्राम व पोस्ट–हरैया, जिला–आज़मगढ़ (उ०प्र०) प्रकाशित पुस्तकें – (1) माटी महकल मोर प्रथम संस्करण 1992, द्वितीय संस्करण 1995 तृतीय संस्करण 2004 (2) पहाड़ भइल जिन्गी (3) अभिव्यक्ति (प्रेस में) सारस्वत सम्मान – (1) गोवर्धन जन कल्याण समिति, आज़मगढ़ उ०प्र० (2) राहुल सांस्कृतायन स्मृति केन्द्र, आज़मगढ़ उ०प्र० (3) साहित्यकार कल्याण परिषद, जौनपुर उ०प्र० कार्यक्षेत्र – प्रधानाध्यापक– परिषदीय विद्यालय महामंत्री– उत्तर प्रदेशीय प्रारम्भिक शिक्षा समिति, उ०प्र० जन कवि के रूप में चर्चित। रुचि – सामाजिक विसंगतियों पर पैनी दृष्टि। विशेष – N.C.E.R.T. द्वारा 14 भाषाओं में राष्ट्रीय एकता अखण्डता सम्बन्धित गीतों की प्रस्तुति हेतु प्रशिक्षित। मोबाइल सं० – 9450738173...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Baledeen Besahara
– गीत – मरेंगे आन पर सदा स्वदेश के लिये सौ बार जन्म लेंगे अपने देश के लिये सौ बार जन्म लेंगे —– जिस देश में बहती है गंगा–यमुना की धारा जिस देश में लहराता है सागर का किनारा करते नमन हिमालयी परिवेश के लिये सौ बार जन्म लेंगे —– पैदा थे जहाँ राम–कृष्ण, गौतम और गाँधी ऊधम, भगत, शेखर चलाये क्रान्ति की आँधी हम भी मिटेंगे जननी के क्लेश के लिये सौ बार जन्म लेंगे —– हिन्दू मुसलमाँ सिक्ख औ ईसाई है यहाँ हर धर्म के अनुयायी भाई–भाई हैं यहाँ कटिबद्ध हैं हम ऐसे ही उपदेश के लिय सौ बार जन्म लेंगे —– हम हैं अनेक फिर भी सदा नेक रहेंगे हम एक थे हम एक हैं हम एक रहेंगे बलिदान बालेदीन का अवशेष के लिये सौ बार जन्म लेंगे —–...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Baledeen Besahara
– ग़ज़ल – दूसरों के कहने पर आग जो लगाएंगे उनका आशियां भी है यहीं कैसे वो बचाएंगे अपनी माँ के आँचल को तार–तार कर रहे जो गर वजूद इसका मिट गया सर कहाँ छुपाएंगे मजहब औ जात–पात से खत्म जो मुहब्बतें हुईं इनको नफरतों का काफिला आप क्या बनाएंगे अपना चेहरा यूँ बिगाड़ना है नहीं उचित ऐ दोस्तों आइना जो सामने पड़ा कैसे मुँह दिखाएंगे बात है समझने की बालेदीन भूलना नहीं प्रेम से जिसे न पा सके बैर से क्या पाएंगे...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Baledeen Besahara
– ग़ज़ल – जाने कि कैसे सपने सजाने लगे हैं लोग फूलों की जगह शूल ही बोने लगे हैं लोग आज अपना वो गौरवमयी इतिहास भूलकर पाश्चात्य सभ्यता में गुम होने लगे हैं लोग मतलब परस्त लोगों की हिम्मत तो देखिये लाकर किनारे नाव डुबोने लगे हैं लोग अपने ही हाथों अपना अस्तित्व बेच कर दिल रो रहा चेहरे से खुश होने लगे हैं लोग जबरन जला के अपनी बहुओं को आज कल घड़ियाली रुलाई यहाँ रोने लगे हैं लोग सदभाव शान्ति सत्य अहिंसा को छोड़ कर बालेदीन अपने खूँ से भिगोने लगे हैं लोग...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Baledeen Besahara
– कविता – सोच सको तो सोचो साम्प्रदायिकता के फैलते हुए जहर पर आतंकवाद के बढ़ते हुए कहर पर जातिवाद की ऊँची उठती हुई लहर पर और प्रदूषण से युक्त अपने शहर पर सोच सको तो सोचो दहेज की आग में जलती हुई बेटियों पर पसीने से भीगी हुई गरीब की रोटियों पर शोषण करने वालों की गगनचुम्बी कोठियों पर और उसी के बगल में दुर्गन्ध युक्त बस्तियों पर सोच सको तो सोचो भूख से तिलमिलाती हुई तरुणाई पर सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती हुई मँहगाई पर हिन्दू मुसलमान सिक्ख ईसाई पर और उनके बीच बढ़ती हुई नफरत की खाई पर सोच सको तो सोचो गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए इन्सान पर सिर्फ पैसों के लिये बिकते हुए ईमान पर वर्तमान दौर के परमाणविक अनुसन्धान पर और इन्हीं सबके बीच अपने प्यारे हिन्दुस्तान पर सोच सको तो सोचो...
by Nazar | Aug 9, 2015 | Baledeen Besahara
– ग़ज़ल – पत्थर चलाके शीशए दिल तोड़ दिया है पल भर में ज़िन्दगी को अलग मोड़ दिया है चलने की क़सम खाई थी ता उम्र साथ–साथ दो पग भी चल न पाया पीछे छोड़ दिया है जिन आँखों में तस्वीर थी उनकी बसी हुई उन आँखों को नश्तर चुभा के फोड़ दिया है जिस दिल में लहू दौड़ता था उनके प्यार का मुट्ठी में भींच भींच के निचोड़ दिया है जब सजदा कर रहा था देवता के दर मैं पीछे से वो गर्दन मेरा मरोड़ दिया है किससे करुँ मैं अर्ज औ शिकवा करुँ किससे जब अपने ही साये ने साथ छोड़ दिया है...