– ग़ज़ल –
दूसरों के कहने पर आग जो लगाएंगे
उनका आशियां भी है यहीं कैसे वो बचाएंगे
अपनी माँ के आँचल को तार–तार कर रहे जो
गर वजूद इसका मिट गया सर कहाँ छुपाएंगे
मजहब औ जात–पात से खत्म जो मुहब्बतें हुईं
इनको नफरतों का काफिला आप क्या बनाएंगे
अपना चेहरा यूँ बिगाड़ना है नहीं उचित ऐ दोस्तों
आइना जो सामने पड़ा कैसे मुँह दिखाएंगे
बात है समझने की बालेदीन भूलना नहीं
प्रेम से जिसे न पा सके बैर से क्या पाएंगे
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