by Nazar | Oct 4, 2015 | Aman Chandpuri
वास्तविक नाम – अमन सिंह जन्मतिथि – 25 नवम्बर 1997 ई. स्थान – चाँदपुर पिता – श्री सुनील कुमार सिंह शिक्षा – स्नातक विधाएँ – कविता, हाइकु, क्षणिका, नज़्म, दोहा, कुंडलिया एवं आलेख आदि। प्रकाशन – वेब तथा पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पता – ग्राम व पोस्ट – चाँदपुर तहसील – टांडा जिला – अम्बेडकर नगर, यू. पी. 224230 मो. +91-9721869421 ईमेल – kaviamanchandpuri@gmail.com —...
by Nazar | Oct 4, 2015 | Aman Chandpuri
कुछ दोहे… भक्ति नीति अरु रीति की विमल त्रिवेणी होय । कालजयी मानस सरिख ग्रंथ न दूजा कोय ।। जिनको निज अपराध का कभी न हो आभास । उनका होता जगत में पग-पग पर उपहास ।। जंगल-जंगल फिर रहे साधू-संत महान । ईश्वर के दरबार के मालिक क्यों शैतान ।। परदेसी जब से हुए दिखे न फिर इक बार । होली-ईद वहीं मनी जहाँ बसा घर द्वार ।। निद्रा लें फुटपाथ पर जो आवास विहीन । चिर निद्रा देने उन्हें आते कृपा-प्रवीण ।। पथ तेरा खुद ही सखे हो जाये आसान । यदि अंतर की शक्ति की कर ले तू पहचान ।। निश्चित जीवन की दिशा निश्चित अपनी चाल । सदा मिलेंगे राह में कठिनाई के जाल ।। गागर में सागर भरूँ भरूँ सीप आकाश । प्रभुवर ऐसा तू मुझे दे मन में विश्वास ।। प्रियतम तेरी याद में दिल मेरा बेचैन । क्यों तुम दूर चले गए तड़प रहे हैं नैन ।। एक आँख में नीर है एक आँख में पीर । फिर भी तुम हो मारते कटु शब्दों के तीर ।। रे मन सुन करते नहीं दो लोगों से प्यार । एक म्यान में एक ही रहती है तलवार ।। ज्ञानी से ज्ञानी मिले करें ज्ञान की बात । ज्ञान और अज्ञान में होती लातम लात ।। उमर बिता दी याद में, प्रियतम हैं परदेश । निशदिन आते स्वप्न में धरे काम का वेश ।। पावस की ऋतु आगई शीतल बहे बयार । धरती हरियाने लगी चहक उठा संसार ।। इस झूठे संसार में नहीं सत्य का मोल । वानर क्या समझे रतन है कितना अनमोल ।। बैठो यूँ न उदास तुम मंजिल तनिक न दूर ।...
by Nazar | Oct 4, 2015 | Aman Chandpuri
बदलता वक्त परिवर्तित होता जा रहा आज मौसम जाड़ा, गर्मी और बरसात हाय रे ! तीनों भयानक, तीनों निर्मम सह नहीं पाता मेरा बदन एक के गुजरने पर दूसरा बिन बताये शुरू कर देता अपनी चुभन कैसा हैं ये परिवर्तन क्यों होता है ये परिवर्तन समय बदलता रहता है काल का पहिया चलता रहता है। जमाने पर भी इसका असर है बदला-बदला सा हर मंजर है यहाँ नये रंग-रूप नित्य खिलते हैं आजीबो-गरीब मुसाफिर जीवन सफर में मिलते है। पहले छोटे बच्चे सा मैं दिखता था हरेक को बहुत अच्छा लगता था वही कवि कहकर मुझे आज चिढा रहे हैं अपने छोटे से उस मासूम बच्चे को भूलते जा रहे हैं। सच कितना असहाय हो गया मैं कितना बूढा हो गया तुम्हारा ‘अमन’ जमाने से कितना पिछड गया हूँ अकेलेपन के सपने से मैं डर गया हूँ बदलते वक्त के अनुरूप मैं भी ढल जाऊगाँ पुराने खोटे सिक्के की तरह एक बार फिर चल जाऊगाँ। –––...
by Nazar | Oct 4, 2015 | Aman Chandpuri
जलकुम्भी जलकुम्भी तालाब में बह आयी हाय रे किसी ने देखा नहीं देखा भी तो निकाला नहीं वह फैलती ही गई एक नाबालिग जलकुम्भी पहले माँ बनी फिर दादी फिर पर दादी और भी रिश्तें जुड़ते गये तलाब का सारा बदन पूरी तरह से ढक गया जलकुम्भी ने कस के जकड़ लिया है तालाब को और फैलती ही जा रही है अब चिड़ियों का जल-पात्र जलकुम्भी से छिपता जा रहा है विशाल तालाब का अस्तित्व अब मिटा जा रहा है अब वह चिड़ियों को हरे-भरे खेत-सा मालूम होता है और बेचारी चिड़िया दिन भर प्यासी मारी-मारी फिर रही अपना जलपात्र ढूँढ रही हैं दौड़-दौड़ कर उसी तरफ जा रही जहाँ अब खेत है तालाब अब खेत बन चुका है। –––...
by Nazar | Oct 4, 2015 | Aman Chandpuri
सुगन्ध किताबों की अच्छी-सी किताब की सुगन्ध लुभा लेती है मेरे मन को और सुगन्ध तो नई किताब से भी आती है मगर वो अच्छी न हो तो याद दिला जाती है उस पर खर्च किये वो अपने थोड़े से पैसे जो उस वक़्त मेरे लिए अनमोल थे। –––...
by Nazar | Oct 4, 2015 | Aman Chandpuri
मैं नास्तिक हूँ ख़ुदा मुझे पता है तू सब कुछ कर सकता है फिर भी कुछ तो है जो तू नहीं कर सकता। तू भी मेरी तरह है जो सोचता है वही करता है फिर भी कुछ बाकी रह जाता है जैसे मुझ से भी काफी कुछ छूट जाता है। मैं समझता था तू अन्जान है लेकिन तू जानबूझ कर अन्जान बनता है। तुझे मेरा खुशी और गम दिखाई तो देता है मगर तू मुहँ फेर लेता है तुझे मेरी चीखें सुनाई तो देती हैं मगर तू कान बन्द कर लेता है। तुझे सब ख़बर रहती है कि मुझ पे कैसे-कैसे ज़ुल्मों-सितम ढाया जा रहा है। मगर तू भी मजबूर है तूने भी दुनियादारी सीख ली है तू भी मतलबी हो चुका है मैं तुझ पे विश्वास नहीं करता हूँ अपना काम तेरे भरोसे नहीं छोड़ता हूँ मस्जिद और दरगाह नहीं जाता हूँ तो फिर तू ही भला मेरा क्यों ध्यान दे। मैं छाती ठोककर कहता हूँ मैं नास्तिक हूँ मगर अब तू बता तू क्या है जो मुझे इस मतलबी दुनिया में अकेला छोड़ कर चला गया मुझे तो लगता है तू मतलबी है तूने मुझे औरों की भाँति अपना सजदा करने के लिए जमीं पे भेजा था न। मगर तू सुन ले मैं ऐसा नहीं करुगाँ मैं मेहनतकश इंसान हूँ मैं तेरे भरोसे नहीं जीउगाँ...