ग़ज़ल –

पत्थर चलाके शीशए दिल तोड़ दिया है
पल भर में ज़िन्दगी को अलग मोड़ दिया है

चलने की क़सम खाई थी ता उम्र साथ–साथ
दो पग भी चल न पाया पीछे छोड़ दिया है

जिन आँखों में तस्वीर थी उनकी बसी हुई
उन आँखों को नश्तर चुभा के फोड़ दिया है

जिस दिल में लहू दौड़ता था उनके प्यार का
मुट्ठी में भींच भींच के निचोड़ दिया है

जब सजदा कर रहा था देवता के दर मैं
पीछे से वो गर्दन मेरा मरोड़ दिया है

किससे करुँ मैं अर्ज औ शिकवा करुँ किससे
जब अपने ही साये ने साथ छोड़ दिया है

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