गीत

कभी विधर्मी ने लूटा और लूटा कभी फिरंगी ने
आज वतन को लूट लिया नेता बनके शिखण्डी ने
कभी विधर्मी ने लूटा —–

चपरासी के योग्य नया बनकर बैठा अधिकारी है
पापी कामी अधर्म नीच परमेश्वर का पुजारी है
न्याय धर्म का मर्म न जाना न्यायाधीश आनन्दी ने
कभी विधर्मी ने लूटा —–

जरासन्ध धृतराष्ट्र कंस रावण की तानाशाही है
कहने को है प्रजातन्त्र पर सच में नौकरशाही है
जयचन्दों की जय–जय है अब राजनीति की मण्डी में
कभी विधर्मी ने लूटा —–

सरकारी वर्दी में गुन्डे अब तो अच्छे लगते हैं
हिटलर थामस डलहौजी नाज़ी के बच्चे लगते हैं
अन्तर ध्यान धर्म हो गया न्याय की नव नसबन्दी में
कभी विधर्मी ने लूटा —–

मैकाले की शिक्षा व्यवस्था का करता सम्मान है
देवनागरी वैदिक विद्‍या का करता अपमान है
शिक्षा का व्यवसाय किया है बुद्धिहीन बहुरंगी ने
कभी विधर्मी ने लूटा —–

प्रजातन्त्र का जाल बिछाया राजनीति का ज्ञानी है
तन्त्र हुआ आबाद यहाँ जनगण की दुखी कहानी है
देश किया नीलाम सुरेश उस जन नायक पाखण्डी ने
कभी विधर्मी ने लूटा —–

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