– ग़ज़ल –
एहसास न मर जाये कहीं क़ल्बो जिगर में
है रूह भी दरकार बहुत इल्मो हुनर में
बे खौफो ख़तर होके निकलना नहीं अच्छा
शीशे का बदन लेके चटानों के नगर में
एक पल में बदल देती है इन्सान की नीयत
तासीर हुआ करती है कुछ ऐसी नज़र में
पर्दे में ही हो सकती है अस्मत की हिफ़ाज़त
बे पर्दा न लुट जाये कहीं राह गुज़र में
आसान नहीं होती है ये राहे मुहब्बत
रहज़न भी मिला करते हैं उल्फ़त की डगर में
गुलशन में न्याज़ अपना क़दम रखना संभल के
काँटे भी हुआ करते हैं फूलों के शजर में
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