– ग़ज़ल –
जाने कैसा खुमार रहता है
दिल मेरा बेक़रार रहता है
जिन्दगी अपने ढंग से जीता हूँ
दिल पे कब अख्तियार रहता है
साथ साया भी छोड़ देता है
कौन गर्दिश में यार रहता है
जिसको मैं फूल समझ लेता हूँ
आगे चल कर वो खार रहता है
कल निकाला था जिसको पस्ती से
मेरे सर पर सवार रहता है
लाख बचता फिरुँ मगर ऐ न्याज़
दिल ग़मों का शिकार रहता है
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