ग़ज़ल

बच्चे होनहार हो गये
रौनक़े बहार हो गये

फ़ासला था जिनसे उम्र भर
वो गले का हार हो गये

गुल बरस रहे हैं हमपे यूँ
जैसे हम मज़ार हो गये

हश्र का यक़ीन हो गया
लोग बेशुमार हो गये

ठोकरें जब अपनों से मिलीं
ग़ैर मेरे यार हो गये

आज हर तरफ ख़ोलूसो-मेह्र
नज़रे-इन्तशार हो गये

अब तो अपना ज़ुल्म रोकिये
हम भी होशियार हो गये

राशिद आज अपने शह्र में
राह का ग़ुबार हो गये

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