मोहे आई न जग से लाज

मालूम नहीं ऐ जाने जहाँ‚ ये कैसी हेमाक़त कर बैठे
अपनों पे सितम गैरों पे करम‚ फिर आज अदावत कर बैठे
कब सुब्ह हुई कब शाम ढली‚ तूफान वही दिल में उट्ठा
कुछ दिल ने कहा कुछ हमने कहा‚ और प्यार मुहब्बत कर बैठे

बड़े खूबसूरत अन्दाज़ में और तरन्नुम के साथ खनकती आवाज़ में शायर हसरत डोमिनगढ़ी साहब ये शेर पढ़ते हुए एक सुनसान गली से गुज़र रहे थे। उनका तअल्लुक किसी देहात से था, वहीं से वो पढ़े-लिखे थे और उनकी शायरी भी वहीं से एक चिलम नवाज शायर के जरिये परवान चढ़ी थी। वो हमेशा इसी अन्दाज़ के शेर सुनाया करते थे। उनके पास खुद की लिखी हुई एक किताब थी जिसमें उनकी सारी ग़ज़लें इसी अन्दाज़ की थीं। पूछने पर उन्होंने बताया कि मैं अपने एक नाराज़ शागिर्द शायर हमदम बनारसी से मिलने जा रहा हूँ। हमदम बनारसी के बारे में ये मशहूर था कि वो तीन या चार बहरों में ही ग़ज़ल लिखा करते थे। अपने खास अन्दाज़ में वो शेर कहा करते थे। वो फरमाते हैं-

अन्दाज़ अनोखे हैं अपने, लिखता हूँ मुहब्बत के सपने
हर शेर हैं मेरे अफसाने, हर शेर नज़ाकत के सपने
गाये जो कोई दिल से इसको, महफिल में खमोशी छा जाये
शायर हूँ मुहब्बत का मारा, ढोता हूँ हक़ीक़त के सपने

दोस्तो सिर्फ एक बहर में शेर कहना और एक ही बहर में ग़जल लिखना तो धीरे-धीरे आसान हो जाता है लेकिन कई बहरों पर शेर कहना या बहर बदल-बदल कर शेर कहना बहुत मुश्किल होता है। इससे मिसरे लड़खड़ा जाते हैं यानी मिसरों के वज़न बदल जाते हें। अब यही शायर लायक मगहरी को देख लीजिये-

मुहब्बत में हमको दग़ा देने वाले
छुप गये हो कहाँ जफा देने वाले
इन आँखों में लेकर तुम्हारे ही सपने
तुम्हें ढूँढते हैं पता देने वाले

दोस्तों इस तरह के शेर पढ़ने पर आज की नौजवान पीढ़ी खूब वाह-वाह करती है और इसी तरह के शायर पूरा मुशायरा लूट लेते हैं। तरन्नुम से पढ़ने वाले शायरों को तो सभी जानते हैं। मिसरा चाहे जैसा भी हो, बहरेें भी कई तरह की हों मगर शायर मौसूफ उसे खींचतान कर लय में ढाल देते हैं और सुनने वालों को बहुत मज़ा आता है। सामईन भी दिल खोल कर खूब दाद देते हैं, और, एक और की फरमाइश भी करते हैं। डोमिनगढ़ के ही तरन्नुम के एक बेताज बादशाह शायर पूरे जोश और होश के साथ फरमाते हैं-

मुहब्बत के तराने गाये जा
प्यास दिल की अपने बुझाये जा
ये दुनिया हंसती रहे तो हंसने दे
प्यार का हसीं गुलाब खिलाये जा

लेकिन सामईन में से कुछ समझदार लोग ऐसे शायरों पर तन्ज़ भी बोलते हैं। और कुछ शायर जो अपने आप को उस्ताद समझते हैं, ऐसे शायरों को मश्वरा लेने की सलाह भी देते हैं। दोस्तों‚ शायरों की भी कई किस्में होती हैं, जैसे उस्ताद शायर, कमाल का शायर, बेकार शायर, नकलची शायर, दिलरुबा शायर, गम़गीन शायर, स्टेज का शायर, गवइया शायर, मनहूस शायर, दिलजला शायर वगैरह वगैरह। यहाँ एक दिलजले शायर अश्क डोमिनगढ़ी का ज़िक्र कर देना जरूरी समझता हूँ। दूसरों की ग़ज़ल चुराना या पैसों के दम पर ग़ज़ल लिखवाना उनकी आदतों में शुमार था। इसी वजह से उनकी बड़ी बदनामी होती थी। बदनामी से बचने के लिये उन्होंने एक खास तरह का फार्मूला निकाल लिया था जिसमें कई गुमनाम शायरों की ग़ज़लें सामने रखकर, एक मिसरा किसी का तो दूसरा मिसरा किसी का लेकर अपने लिये एक ग़ज़ल तैयार कर लेते थे। इस हिकमत से कभी कभी अच्छी ग़ज़ल भी बन जाती थी जिसे सुनाने पर खूब वाह-वाह होती थी और कभी-कभी तो बेतुकी ग़ज़ल भी बन जाती थी जिसे सुनकर सामईन अपना सर पीट लेते थे। एक मतला और एक शेर मुलाहेज़ा फरमाएं-

उजाली रात है जाकर सलाम कर देना
सामने उनके ख़त फाड़ कर तमाम कर देना
यही वो इश्क़ है आँखों से निभाते हैं आये
वफा के नाम पर थोड़ा सा काम कर देना

इसी तरह के एक बेतुके शायर भी गुजरे हैं जिनका नाम सुनते ही लोग तालियां और सीटियां बजाने लगते थे, थे बड़े कमाल के शायर। वो भी कई तरह के नामचीन शायरों, गुमनाम शायरों, बेबाक शायरों की ग़ज़लों को सामने रखकर मिसरों की अदला बदली से ग़ज़ल तैयार करने में माहिर थे। किसी प्रोग्राम में स्टेज से उन्होंने ये पढ़ा-

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
हमारी तरह के अमां और भी हैं
चलाओ न तीरे नज़र के इशारे
कि दर्दो-अलम के निशा और भी हैं

मुहब्बत की सोच रखने वाले एक यतीम शायर जिन्हें कभी अपनी बेगम पर बड़ा नाज़ हुआ करता था, एक बार उन्होंने अपनी बेगम को ससुराल से बुलाने के लिये ख़त लिखा कि जल्दी चली आओ, रात में कुत्ते भूँकते हैं, नींद नहीं आती। दोस्तो यहाँ हम उन्हीं की हसरतों की एक ग़ज़ल आपके सामने पेश कर रहे हैं।

मुसीबत मेरे दिल की बदनाम होती
तड़प आंसुओं की न बेजान होती

शिकायत न करते कभी शायरी में
हिमाकत भी अपनी दिलोजान होती

मददगार होते सभी शायरों के
पड़ोसन कवित्री भी मेहमान होती

इशारे ज़माने के मिलते मुझे भी
हमेशा वफाओ से पहचान होती

कड़क धूप में भी कबूतर उड़ाते
अमीरे शहर में भी एक शान होती

मुसीबत में जीनेे की आदत न रहती
गली में हरेक से घमासान होती

फटेहाल शायर दिखाते करिश्मा
मुहब्बत भी उनपर मेहरबान होती

दोस्तों‚ फिल्मों के हवाले से याद आ रहा है कि आज से 40-50 साल पहले जो भी गीत लिखे जाते थे वो कहानी का ही एक हिस्सा होते थे और प्यार मोहब्बत पर आधारित होते थे। सुनने वालों को ये गीत दीवाना बना देते थे। लोग उस गीत में इतना डूब जाते थे कि जैसे वह गीत उनके ही जीवन पर लिखा गया है। यही वजह थी कि उन गीतों को सुनने के लिये लोग बार–बार उस फिल्म को देखने जाते थे। आज उन फिल्मों का अता-पता नहीं‚ गीताकार कहाँ गये‚ संगीतकार और उनके आरकेस्ट्रा के लोग कहाँ गये‚ किसी को याद नहीं लेकिन वो गीत ⁄ गाने‚ संगीत और गायक आज भी जिन्दा हैं और जिन्दा रहेंगे।

मेरा यार बना है दूल्हा
और फूल खिले हैं दिल के
अरे मेरी भी शादी हो जाये‚
दुआ करो सब मिल के
मेरा यार बना है. . .

Nazar Maghari
shayervalley@gmail.com