———– ग़ज़ल ————

अगर तारीक मुस्तकबिल है तुम से क्या मतलब
चमन वीरां सही मेरा बहारो तुम से क्या मतलब

मेरी रूदादे ग़म रस्मन न पूछो दोस्तो मेरे
बताऊँ क्या तुम्हें झूठे सहारो तुम से क्या मतलब

अगर तामीर शाखे गुल पे मेरा आशियाना है
तो ऐ बरके तअस्सुब के शरारो तुम से क्या मतलब

करूँगा मैं ग़ज़ल ख्वानी तुम्हारी खुश अदाई पर
लिये तुम आइना जुल्फें संवारो तुम से क्या मतलब

हक़ाएक़ जब कभी अखबार की जीनत नहीं बनते
चमन जलने दो ऐ नामा निगारो तुम से क्या मतलब

पिलाता है अगर अतहर को साक़ी जाम नज़रों से
तो रिन्दो, मयकशो, बादा गुसारो तुम से क्या मतलब

– अतहर अब्दुल्लाह सौदागर
सुकरावल, टांडा, अम्बेडकर नगर उ०प्र०