– ग़ज़ल –

अजब अपना हाल होता जो विसाले यार होता
कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता

कोई फ़ितना ता कयामत न फिर आशकार होता
तेरे दिल पे काश ज़ालिम मुझे अख्तियार होता

जो तुम्हारी तरह तुमसे कोई झूटे वादे करता
तुम्हीं मुन्सफी से कह दो तुम्हे एतबार होता ?

ग़मे इश्क में मज़ा था जो उसे समझ के खाते
ये वो जहर है कि आखिर मये खुशगवार होता

न मज़ा है दुश्मनी में न है लुत्फ दोस्ती में
कोई गैर ग़ैर होता कोई यार यार होता

ये मज़ा था दिल्लगी का कि बराबर आग लगती
न तुझे क़रार होता न मुझे क़रार होता

तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते
अगर अपनी ज़िन्दगी का हमें एतबार होता

ये वो दर्दे दिल नहीं है कि हो चारा साज़ कोई
अगर एक बार मिलता  तो हज़ार बार होता

गये होश तेरे ज़ाहिद जो वो चश्मे–मस्त देखी
मुझे क्या उलट न देती जो न बादा–ख्वार होता

मुझे मानते सब ऐसा कि अदू भी सजदे करते
दरे यार काबा बनता जो मेरा मज़ार होता

तुम्हें नाज़ हो न क्यों कर कि लिया है दाग़ का दिल
ये रक़म न हाथ लगती न ये इफ्तेखार होता

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(शायर– दाग़ देहलवी)