– ग़ज़ल –
अम्न की जब हम जोत जगाने लगते हैं
अम्न के दुश्मन शोर मचाने लगते हैं
अम्न का जब तामीर नशेमन होता है
ज़ुल्म के बादल बम बरसाने लगते हैं
बाज़ आओ शाख़ों से कलियां मत तोड़ो
फूल से ही गुलज़ार सुहाने लगते हैं
तस्वीर जला के बाप की बेटा ये बोला
घर में ये आसार पुराने लगते हैं
देर नहीं लगती है इज़्ज़त जाने में
इसे बनाते बड़े ज़माने लगते हैं
देख के मेरे दुश्मन मेरी खुशियों को
दीवारों से सर टकराने लगते हैं
वक़्त हमें ले आया देखो कहाँ न्याज़
अपने जितने थे बेगाने लगते हैं
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