कसक मुहब्बत की ़़़़़़़़
दिल से उड़ा कर प्यार का तूफान हम चले
खुद को हंसा कर शाम के मेहमान हम चले
फिक्र जरा भी गम नहीं कुछ अब तो राह की
सबको जगा कर आज के इन्सान हम चले
वाह क्या आवाज है क्या अदाकारी है, क्या खुले दिल से तरन्नुम में शेर पढ़ा है बेचैन साहब ने। हमीद जगतबेलवी साहब इस शेर को सुनकर दुआएं दे रहे थे। हमीद जगतबेलवी साहब भी अपनी जवान धड़कन के ज़माने में ऐसा ही शेर सुनाया करते थे। वह अकसर एक मशहूर शायर का शेर पढ़कर खुद को तसल्ली दे लिया करते थे-
ये रब्ते मुहब्बत भी क्या खूब मुहब्बत है
दिल उनका वहाँ धड़का आवाज यहाँ आई
बिल्कुल सही फरमाते थे हमीद जगतबेलवी साहब। आज के भाग दौड़ के जमाने में प्यार की कमी की वजह से इन्सान बेसुरा और चिड़चिड़ा होता दिखाई दे रहा है। वो दिन दूर नहीं जब यही इन्सान जानवरों की तरह बरताव करने लगेगा और तब प्यार-मुहब्बत के माने बदल चुके होंगे। लोग एक दूसरे से दूर होते दिखाई देंगे। रिश्ते नाते भी बिगड़ चुके होंगे। उन हालात में साबिर डोमिनगढ़ी का यह शेर जरूर याद आएगा।
मुश्किल है ऐ दिल प्यार यहाँ
होती है अब तकरार यहाँ
किसके लिये मैं आह भरुँ
जीना भी है दुश्वार यहाँ
एक दिलजले और मुहब्बत के सताए शायर समीर घन्टाघरी का यह शेर भी बहुत याद आएगा-
चल कहीं और चल लेके प्यार जवाँ
दब न जाये कसक देख यार जवाँ
जि़न्दगी का मज़ा ग़म बग़ैर नहीं
प्यार ले प्यार दे है बहार जवाँ
दोस्तो कभी ग़म के शोले भड़कें गे तो आपको हफ़ीज़ खलीलाबादी की याद भी आएगी, वही हफीज खलीलाबादी जिन्हें दूसरे शायरों के शेर को बदलने का हुनर मालूम था। वो फरमाते हैं-
किसी की याद में घर को तबाह मत करना
अगर घर जल भी जाये यार आह मत करना
मुहब्बत की अगर चाहत है जि़न्दगानी में
बहक कर भूल से कोई गुनाह मत करना
दोस्तों, मुहब्बत में नाकामी ही अकसर शायर और शायरी को जनम देती है। और यही वजह है कि शायर निकम्मे और दिलजले होते हैं। ऐसे लोगों की तकरार अपनी बेगम से शुरु हो कर किसी शेर पर जाकर खत्म हो जाती है। आप रफीक घन्टाघरी को देख लीजिये, जब वो कोई ग़ज़ल लिखने बैठते थे तो जब तक पूरी न हो जाये उठते नहीं थे, उनके इसी निकम्मेपन की वजह से बेगम से उनकी तकरार भी हो जाया करती थी, कभी-कभी तो उन्हें वक्त पर खाना भी नसीब नहीं होता था। लेकिन रफीन साहब भी बड़े मनचले और कठोर तबीयत के शायर थे। ग़ज़ल जब पूरी हो जाती तो सबसे पहले अपनी बेगम को ही सुनाते और उनसे मशवरा भी लेते। वो फरमाते हैं-
लिखी अपनी ग़ज़ल गाते रहे बरसों
किसी के ग़म को सुलझाते रहे बरसों
मगर हसरत न पूरी हो सकी अपनी
मुहब्बत करके पछताते रहे बरसों
रफीक घन्टाघरी के एक दोस्त शायर थे कमाल विलायती। बेचारे दिलजले तो थे ही लेकिन मनहूसियत उनके चेहरे पर हमेशा दिखाई देती थी। मुहब्बत के बारे में कमाल विलायती का अपना एक अलग खयाल था और इसी अन्दाज़ में वो शेर कहा करते थे-
दिल के अरमां बुझा के देख लिया
हाल अपना बता के देख लिया
कोई हमदम मिला न दोस्त कहीं
आप बीती सुना के देख लिया
मुहब्बत के माने समझाते हुए अपनी बेगम के सताये हुए एक गुमनाम शायर कबीर डोमिनगढ़ी अपनी दास्तान में लिखते हैं-
ख्वाब मेरे यही आवाज़ दिया करते हैं
ऐ मुहब्बत तुझे हम याद किया करते हैं
लोग देते रहें इल्ज़ाम मगर ये सच है
वास्ते प्यार के हम सबसे मिला करते हैं
अब जो मुहब्बत की बात चल ही रही है तो क्यों न एक ऐसे बेमिसाल दिलजले शायर आरिफ खलीलाबादी का शेर भी सुना दिया जाये जो तनहाई में रहकर भी नये अन्दाज़ से जीता है-
बिन तेरे कुछ मज़ा और आता नहीं
आज आँखों को केई भी भाता नहीं
ऐ मुहब्बत तू दिल में उतर जा अभी
जाने क्या है कि दिल रोज़ गाता नहीं
दोस्तो अब वो घड़ी आ ही गई है कि आपको एक ऐसे कवि से मिलाऊँ जो लिखने में तो बहुत तेज हैं मगर लिखते-लिखते वो यह भूल जाते हैं कि समय पर घर भी पहुँचना है। वह केवल गोष्ठियों में ही देखे जाते है। लोग उनकी रचनाओं को सुनकर कभी-कभी अपना सर पकड़ लेते हैं और रचना पाठ जल्दी खत्म करने के लिये झूठी वाह-वाह भी करते हैं। दोस्तो उनका नाम है नील नवल जटेपुरी। उनकी रहस्यमयी रचनाएं मन की आतुरता को स्वप्निल बनाये रखती हैं। आप उन्हें भी सुनें। माइक पर नील नवल जटेपुरी साहब-
कवि, शायर एवं श्रोता वृन्द सबसे पहले मैं आपके समक्ष अपने हृदय के उद्गार से निकली हुई चार पंक्तियां पढ़ते हुए आपका आशीर्वाद चाहूँगा-
निर्विवाद लेखन में जो प्रेम अलंकृत है
माननीय पाठन में भी शब्द झंकृत है
प्रम का सम्बन्ध ही तो परिचय दिशा में
मन को आह्लादित करता यथा पुरस्कृत है
श्रोता बन्धु अब आप जिसे सुनना चाहते हैं वही गजल मैं आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ, आशीर्वाद दें-
समाधान होता तो बलवान होती
अमंगल प्रशंसा भी आदान होती
तपस्या से माया को देते रसायन
दलित मन की शोभा आयुष्मान होती
चतूरता से लेखन को जीवंत करते
जटिल भूमिका मुखरित अवधान होती
तपोवन में जाकर शुभारम्भ करते
मनोकामना अर्जित श्रीमान होती
सरलतम सुरों में जो कविता सुनाते
कवित्री मुहल्ले की उपमान होती
समय पर निशा में पत्राचार करते
पड़ोसन तपस्वी भी प्रज्ञान होती
विमोचन कराते लिखकर एक पुस्तक
सकल भूमिका भी शोभायमान होती
फिल्मों के अदब में प्यार मुहब्बत पर बहुत से गीत लिखे गये जो आज भी कर्णप्रिय हैं। ऐसे गीतो को सुनकर दिन में भी ख्वाब दिखाई देने लगते हैं। दोस्तो आजके भाग-दौड़ और कठिन समय में ऐसी ही गीत मन को शान्ति देते हैं जिसमें मुहब्बत की आवाज हो, मुहब्बत की जंग हो, लय हो और जादुई संगीत हो।
बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है
बरसता है जो आँखों से तो सावन याद करता है
बेदर्दी बालमा तुझको ………….
Nazar Maghari
shayervalley@gmail.com