———— ग़ज़ल ———–
चार दिन की चाँदनी है फिर अंधेरी रात है
वो भी अपना हक नहीं है आपकी सौग़ात है
कोई न कोई मेरा हर दिन दुखा जाता है दिल
मेरे घर आके बता जाता मेरी औकात है
अच्छे दिन की मुझको भी उम्मीद थी पर क्या कहूँ
मुश्किलों की रात दिन बढ़ती रही तादात है
मेरी ग़ज़लों को सुने बिन आप जा सकते नहीं
अपनी गा के चल दिये हो ये भी कोई बात है
दूल्हे बिन बारात मेरी जिन्दगी का है सफर
दाल थाली में नहीं है सिर्फ चटनी भात है
सूचियों में छप नहीं पाता कभी ‘साकार‘ है
जाने कैसा नाम मेरा जाने कैसी जात है
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