– ग़ज़ल –
मेरे अफ़कार का सौदा सरे बाज़ार हुआ
एक ऐसा भी तमाशा सरे बाज़ार हुआ
आज फिर ख़ैर नहीं अह्ले जोनूँ की शायद
आज फिर हुस्न का चर्चा सरे बाज़ार हुआ
कोई असमत का ख़रीदार कोई सौदागर
मुझसे मत पूछ कि क्या क्या सरे बाज़ार हुआ
हुस्न ने ख़ुद ही नज़र अपनी उठाई होगी
इश्क़ बेकार ही रुसवा सरे बाज़ार हुआ
ख़ुद ही बीमार हैं और ख़ुद ही मसीहा भी हैं
ये भी एक तर्जे मदावा सरे बाज़ार हुआ
आ गया काम तेरे तेरा जोनूँ ऐ राशिद
कोई तुझसे भी शनासा सरे बाज़ार हुआ
—–