– ग़ज़ल –

उसके दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
वह भी मेरी ही तरह शहर में तनहा होगा

इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे
रौशनी खत्म न कर आगे अन्धेरा होगा

प्यास जिस नहर से टकराई वो बन्जर निकली
जिसको पीछे कहीं छोड़ आये वो दरिया होगा

मेरे बारे में कोई राय तो होगी उसकी
उसने मुझको भी कभी तोड़ के देखा होगा

एक महफिल में कई महफिलें होती हैं शरीक
जिसको भी पास से देखोगे अकेला होगा

(शायर– निदा फाज़ली)