– ग़ज़ल –
आलम ही और था जो शनासाइयों में था
जो दीप था निगाह की परछाइयों में था
वो बेपनाह ख़ौफ़ जो तनहाइयों में था
दिल की तमाम अन्जुमन आराइयों में था
एक लम्हए-फ़ोसूँ ने जलाया था जो दिया
फिर उम्र भर ख़याल की रानाइयों में था
एक ख़्वाब गूँ थी धूप थी ज़ख़्मों की आँच में
एक सायेबाँ सा दर्द की पुरवाइयों में था
दिल को भी एक जराहते-दिल ने अता किया
ये हौसला कि अपने तमाशाइयों में था
कटता कहाँ तवील था रातों का सिलसिला
सूरज मेरी निगाह की सच्चाइयों में था
अपनी गली में क्यों न किसी को वो मिल सका
एतमाद बादिया-पैमाइयों में था
इस अह्दे ख़ुद सिपास का पूछो न माजरा
मसरूफ़ आप अपनी पज़ीराइयों में था
उसके हुज़ूर शुक्र भी आसाँ नहीं अदा
वो जो ग़रीबे-जान मेरी तनहाइयों में था
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(शायरा- स्व0 अदा जाफरी, 1924)