Meena(1)

– ग़ज़ल –

उदासियों ने मेरी आत्मा को घेरा है
रुपहली चाँदनी है और घुप अंधेरा है

कहीं कहीं कोई तारा कहीं कहीं जुगनू
जो मेरी रात थी वो आपका सवेरा है

क़दम क़दम पे बगोलों को तोड़ते जायें
उधर से गुज़रे गा तो रास्ता ये तेरा है

ओफ़क़ के पार जो देखी है रोशनी तुमने
वो रोशनी है खुदा जाने या अंधेरा है

सेहर से शाम हुई शाम को ये रात मिली
हर एक रंग समय का बहुत घनेरा है

ख़ुदा के वास्ते ग़म को भी तुम न बहलाओ
इसे तो रहने दो मेरा यही तो मेरा है

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(फिल्म अभिनेत्री स्व0 मीना कुमारी ’नाज़’)