————- ग़ज़ल —————
लहू मेरा पसीने में बदल कर सूख जाता है
तभी जाकर कहीं परिवार थोड़ा मुस्कुराता है
और उस पर भी ये इल्जाम कि मैंने किया क्या है
मेरे दिल के इलाके में बहुत हलचल मचाता है
न जाने कितनी मुश्किल से दर्द गज़लों में ढलता है
मेरे गीतों को तब कोई रह–रह गुनगुनाता है
ये अनदेखी बुढ़ापे में ग़ज़ब का दर्द देती है
जख्म ऐसा कि जिसको कोई–कोई देख पाता है
बिना पूछे क्यों पैदा किया बच्चे पूछते हैं
ये गलती वो न दोहराए मेरा जीवन सिखाता है
तुम आंसू को गजल कह कर मुझे मायूस मत करना
दिल–ए–साकार रोता है लोग कहते हैं गाता है
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