———— ग़ज़ल ————
जिन्दगी को एक अदद आधार मिल जाता अगर
मेरी कुर्बानी पे ये उपहार मिल जाता अगर
शान से जी लेता मैं भी चार दिन की ज़िन्दगी
प्यार के बदले में मुझको प्यार मिल जाता अगर
बेच लेता मैं भी अपनी ज़िन्दगी की डायरी
शायरी का मुझको कारोबार मिल जाता अगर
आप सबकी भाँति मैं भी घर बसा लेता कहीं
सिर्फ दो बाहों का कारागार मिल जाता अगर
शायरी का ये हुनर पहले ही आ जाता मुझे
आप ही की भाँति एक किरदार मिल जाता अगर
ठीक से सो लेता मैं भी उम्र भर में एक दिन
उम्र भर में एक भी रविवार मिल जाता अगर
यूँ शुरु से अन्त तक ये डायरी रोती नहीं
वक्त पर ‘साकार‘ को उपचार मिल जाता अगर
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