– गजल –
यकीं हो गया बागबां के चलन से
अभी दूर है मौसमे गुल चमन से
करें साजिशें रहनुमा राहजन से
नहीं काम चलने का अब मकरो फन से
तेरी बज्मे रंगीं का क्या हश्र होगा
अगर उठ गये हम तेरी अंजुमन से
ये सच है तअल्लुक है जम–जम से मुझको
मोहब्बत भी रखता हूँ गंगो जमन से
कभी पत्थरों से न कुछ जर्ब पहुँची
कभी चोट आई गुलो नस्तरन से
सदाकत परस्ती है जब अपना मसलक
हमें खौफ फिर क्यों हो दारो रसन से
तुम्हारे लिये जिन्दगी वक्फ कर दी
तुम्हें और क्या चाहिये अह्लेफन से
तमाशा जरा देखिये सुब्हे नौ का
एजाफा अंधेरे में है हर किरन से
नहीं कुजकलाहों को दौरां शनासी
निकलते हैं अब भी उसी बांकपन से
हुआ खून जौहर मेरी हसरतों का
जो पाला पड़ा एक पैमां शिकन से
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