तरानए आज़ाद हिन्दोस्तान

शरीके जंगे आज़ादी हर एक पीरो जवां होगा
वो दिन नज़दीक है आज़ाद जब हिन्दोस्तां होगा

डुबोई जाएगी बहरे अरब में ज़ुल्म की कश्ती
हर एक देवे सितम फिर ग़र्क बहरे बेकरां होगा

फ़ेज़ा बदली नज़र आएगी इसकी दौरे दौरां से
नई इसकी ज़मी होगी नया ही आसमां होगा

वतन के लोग होंगे इश्तराके कार पर माएल
न होगा कोई महकूम और न कोई हुकमरां होगा

न खौफे बर्क़ होगा और न कुछ सइयाद का खटका
चमन अपना ही होगा और अपना बाग़बां होगा

यहाँ की खाके मुर्दा में नई जां आएगी फिर से
हर एक ज़र्रा मिसाले मेहरे ताबां ज़ौफेशाँ होगा

मोसर्रत के तराने गाएंगे आपस में सब मिल कर
फरावानी खुशी की होगी हर एक शादमां होगा

बहारें खिंच के आजाएं गी इसके गोशे गोशे में
ये उजड़ा गुल्सितां सद नाजि़शो रश्के जनां होगा

जेहालत, तंगदस्ती, मुफलिसी मिट जाएगी आखि़र
यहाँ बेरोज़गारी का न कुछ नामो निशाँ होगा

वतन मरकज़ बनेगा हर तरह के इल्मो दानिश का
ये एक दिन नाक़ए तहज़ीब का भी सारेबाँ होगा

इसे हैरत से देखेंगे तरक्क़ी याफ्ता किश्वर
बवजहे शर्म उनके मुँह पे एक उड़ता धुआँ होगा

यक़ीं है और हाँ कामिल यक़ीं है मुझको ऐ जौहर
ओरूजे कामयाबी पर कभी हिन्दोस्ताँ होगा

–––– 1942 ––––