हिन्दी ग़ज़ल

शब्द की चंचल धरा पर सार अलंकृत हो गये
भाव विह्वल काव्य के सब घाव विस्मृत हो गये

स्मरण जागा तो अवसरवाद सपने खिल उठे
सार्थक रचना के सारे भाव भंगृत हो गये

प्रेरणा लेकर वे पुष्पित पल्लवित जब हो गये
विघ्नता के मर्म स्थल सब मयंकृत हो गये

प्यार के दो शब्द अविरल भावना में क्या बहे
मित्रवत संवेदना के क्षण पुरस्कृत हो गये

अर्थ की दयनीय स्थिति मर्म पर बोझिल हुई
मंत्रणा की भूल से उत्साह जागृत हो गये

मान्यवर आक्रोश चिन्तन आच्छादित जब हुआ
योनि की हुंकार से आवेश विस्तृत हो गये

डूब कर हिन्दी में हम भी ऐ नज़र कुछ कह गये
ये तो महिमा कंठ की है शब्द अमृत हो गये

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