————– ग़ज़ल ————–

जब मुस्कुराने को हुए लब मेरे बेकरार

पहरे लगे हैं उनपे ज़माने के बेशुमार

देखे हैं यूँ तो हमने हसीं ख्वाब बार बार

ताबीर देख कर मगर आँखें हैं अश्कबार

दुश्मन भी अपना गर हुआ नादिम ख़ताओं पर

सीने से अपने उसको लगाया है हमने यार

दामन में सबको प्यार से रक्खा समेट कर

राहों में मेरे फूल मिले या मिले हों खार

मैंने दिया जला के लहू से जो रख दिया

तूफाँ उसे बुझ ाने को आया है बार बार

बादे बहार एक नज़र उस तरफ भी हो

जिस गुलशने ख़ेजाँ में न आई कभी बहार

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