ग़ज़ल
क्या मिलेगा कभी सोचा फलाँ में
मत उलझ इस हिसाबे दोस्ताँ में
खो गये किस अजब सी दास्ताँ में
चल ज़रा ढँढ लायें कुछ ख़ेजाँ में
गुलरुखो आ भी जाओ साथ दे दो
मौसमो लाज रखना गुलसिताँ में
वहशते दिल तुझे मिल जायेगा वो
ढँढता रेशमी आँचल जहाँ में
रहबरों में बदलने का चलन अब
ज़ह्र भर दे न फिर इस जिस्मो–जाँ में
खैरियत पूछते हो अब मेरी तुम
लग रहा तुम भी हो अब मेह्रबाँ में
जंग होगी वफ़ा के दोश पर भी
दिख रहा है धुआँ दुश्मन ज़माँ में
खास कुछ भी नहीं सोचो नज़र ये
खास सब कुछ नजर आता गुमाँ में
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