ग़ज़ल

हम तो खुश थे कि चलो दिल का जुनूँ कुछ कम है
अब जो आराम बहुत है तो सुकूँ कुछ कम है

रंगे गिरिया ने दिखाई नहीं अगली सी बहार
अबके लगता है कि आमेज़िशे खूँ कुछ कम है

अब तेरा हिज्र मोसलसल है तो ये भेद खुला
ग़मे दिल से ग़मे दुनिया का फोसूँ कूछ कम है

उसने दुख सारे ज़माने का मुझे बख्श दिया
फिर भी लालच का तक़ाज़ा है काहूँ कुछ कम है

राहे दुनिया से नहीं दिल की गुज़रगाह से आ
फ़ासला गरचे ज़ियादा है पे यूँ कुछ कम है

तुमने देखा ही नहीं मुझको भले वक्तों में
ये खराबी कि मैं जिस हाल में हूँ कुछ कम है

आग ही आग मेरे गर ये तन में है फ़राज़
फिर भी लगता है अभी साज़े दोरुँ कुछ कम है

––